एक साथ तीन पादरी मुसलमान

Posted by इस्लामिक वेबदुनिया on 09:37


अमेरिका के तीन ईसाई पादरी इस्लाम की शरण में आ गए। उन्हीं तीन पादरियों में से एक पूर्व ईसाई पादरी यूसुफ एस्टीज की जुबानी कि कैसे वे जुटे थे एक मिस्री मुसलमान को ईसाई बनाने में, मगर जब सत्य सामने आया तो खुद ने अपना लिया इस्लाम।

   बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि आखिर मैं एक ईसाई पादरी से मुसलमान कैसे बन गया? यह भी उस दौर में जब इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ हम नेगेटिव माहौल पाते हैं। मैं उन सभी का शुक्रिया अदा करता हूं जो मेरे इस्लाम अपनाने की दास्तां में दिलचस्पी ले रहे हैं। लीजिए आपके सामने पेश है मेरी इस्लाम अपनाने की दास्तां-

   मैं मध्यम पश्चिम के एक कट्टर इसाई घराने में पैदा हुआ था। सच्चाई यह है कि मेरे परिवार वालों और पूर्वजों ने अमेरिका में कई चर्च और स्कूल कायम किए। 1949 में जब मैं प्राइमेरी स्कूल में था तभी हमारा परिवार टेक्सास के हाउस्टन शहर में बस गया। हम नियमित चर्च जाते थे। बारह साल की उम्र में मुझे ईसाई धार्मिक विधि बेपटिस्ट कराई गई। किशोर अवस्था में मैं अन्य ईसाई समुदायों के चर्च,मान्यताओं,आस्था आदि के बारे में जानने को उत्सुक रहता था। मुझे गोस्पेल को जानने की तीव्र लालसा थी। धर्म के मामले में मेरी खोज और दिलचस्पी सिर्फ ईसाई धर्म तक ही सीमित नहीं थी हिंदू,यहूदी,बोद्ध धर्म ही नहीं बल्कि दर्शनशास्त्र और अमेरिकी मूल निवासियों की आस्था और विश्वास भी मेरे अध्ययन में शामिल रहे। सिर्फ इस्लाम ही ऐसा धर्म था जिसको मैंने गंभीरता से नहीं लिया था।
  इस दौरान मेरी दिलचस्पी संगीत में बढ़ गई। खासतौर से गोस्पल और क्लासिकल संगीत में। चूकि मेरा पूरा परिवार धर्म और संगीत के क्षेत्र से जुड़ा हुआ था इसलिए मैं भी इन दोनों के अध्ययन में जुट गया। और इस तरह मैं कई गिरिजाघरों से संगीत पादरी के रूप में जुड़ गया। मैंने 1960 में लोगों को की बोर्ड के जरिए संगीत की शिक्षा दी और फिर 1963 में लॉरेल,मेरीलेण्ड में अपना ‘एस्टीज म्यूजिक स्टूडियो’ खोल लिया। इसके बाद मैंने करीब तीस साल तक अपने पिता के साथ मिलकर कई बिजनेस प्रोजेक्ट तैयार किए। हमने बहुत सारे मनोरंजन प्रोग्राम बनाए और कई शो किए। हमने टेक्सास और ऑकलाहोम से फ्लोरिडा के बीच कई पियानो और ऑरगन स्टोर खोले। इन सालों में मैंने करोड़ों डॉलर कमाए। करोड़ों डॉलर कमाने के बावजूद दिल को सुकून नहीं था। सुकून तो सच्चाई की राह पाकर ही हासिल हो सकता था।

   मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि आपके मन में भी यह सवाल उठते होंगे-आखिर ईश्वर ने मुझे किस मकसद के लिए पैदा किया है? ईश्वर को मुझसे किस तरह की अपेक्षा है? आखिर ईश्वर कौन है? हम मूल पाप में यकीन क्यों रखते हैं? इंसान को अपने पाप स्वीकारने के लिए क्यों मजबूर किया जाता है और इसके परिणामस्वरूप उसे सदा के लिए सजा क्यों दी जाती है?
   अगर आप किसी से यह सवाल पूछते हैं तो आपसे कहा जाता है कि आपको ऐसे सवाल पूछे बिना अपने धर्म पर यकीन करना चाहिए या यह तो रहस्य है,ऐसे सवाल नहीं किए जाने चाहिए।

ठीक इसी तरह ट्रीनिटी(तसलीस) का सिद्धान्त भी है। अगर मैं किसी धर्मप्रचारक या किसी ईसाई पादरी से पूछता कि-‘एक’ अपने आप में तीन में कैसे बदल सकता है? ईश्वर तो कुछ भी करने की ताकत रखता है तो फिर लोगों के पाप कैसे माफ नहीं कर सकता? उसे जमीन पर एक इंसान के रूप में आकर सभी लोगों के पाप अपने ऊपर लेने की आखिर कहां जरूरत पड़ी? हमें याद रखना चाहिए की वह तो सारे ब्रह्माण्ड का पालक है,वह तो चाहे जैसा कर सकता है।
   1991 में एक दिन मुझे यह जानकारी मिली कि मुसलमान बाइबिल पर यकीन रखते हैं। मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। आखिर ऐसे कैसे हो सकता है? इतना ही नहीं मुसलमान तो ईसा पर ईमान रखते हैं कि वे ईश्वर के सच्चे पैगम्बर थे और उनकी पैदाइश बिना पिता के अल्लाह के चमत्कार के रूप में हुई। ईसा अब ईश्वर के पास हैं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अंतिम दिनों में फिर से इस जमीन पर आएंगे और एंटीक्राइस्ट(दज्जाल)के खिलाफ ईमान वालों का नेतृत्व करेंगे।

मुझे यह सब जानकर बड़ी हैरत हुई। दरअसल मैं जिन ईसाई पंथ वालों के साथ सफर किया करता था वे इस्लाम और मुसलमानों से सख्त नफरत किया करते थे। वे लोगों के बीच इस्लाम के बारे में झूठी बातें करके लोगों को भ्रमित करते थे। ऐसे में मुझे लगता था कि मुझे इस धर्म के लोगों से आखिर क्या लेना-देना।

मेरे पिता चर्च से जुड़े कामों में जुटे हुए थे, खासतौर पर चर्च के स्कूल प्रोगाम्स में। 1970 में मेरे पिता अधिकृत रूप से पादरी बन गए। मेरे पिता और उनकी पत्नी(मेरी सौतेली मां)बहुत से ईसाई धर्म प्रचारकों को जानते थे। वे अमेरिका में इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन पेट रॉबर्टसन के नजदीकियों में से थे।

1991 में मेरे पिता ने मिस्र के एक मुसलमान शख्स के साथ बिजनेस शुरू किया। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उस शख्स से मिलूं। मैं बड़ा खुश हुआ कि चलो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामकाज होगा। लेकिन जब मेरे पिता ने मुझे बताया कि वह शख्स मुसलमान है तो पहले तो मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। मैंने कहा-एक मुसलमान से मुलाकात करूं? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं नहीं मिलना चाहता किसी मुस्लिम से। हमने इनके बारे में बहुत सी बातें सुनी हैं। ये लोग आतंकवादी होते हैं, हवाई जहाज अगवा करते हैं, बम विस्फोट करते हैं,अपहरण करते हैं और ना जाने क्या-क्या करते हैं। वे ईश्वर में भरोसा नहीं करते। दिन में पांच बार जमीन को चूमते हैं और रेगिस्तान में किसी काले पत्थर की पूजा करते हैं।

मैंने इनसे कह दिया मैं किसी मुसलमान शख्स से नहीं मिल सकता। मेरे पिता ने मुझ से कहा कि वह बहुत अच्छा इंसान है और मुझ पर जोर डाला कि मैं उससे मिलूं। आखिर में मैं उस मुसलमान शख्स से मिलने को तैयार हो गया और शर्त रखी कि मैं सण्डे के दिन चर्च में प्रार्थना करने के बाद ही उससे मिलूंगा। मैंने हमेशा की तरह बाइबिल अपने साथ ली,चमकता क्रॉस गले में लटकाकर उससे मिलने पहुंचा। मेरी टोपी पर ठीक सामने लिखा था-जीसस ही रब है। मेरी पत्नी और दो छोटी बेटियां भी मेरे साथ थीं। अपने पिता के ऑफिस पहुंचकर मैंने उनसे पूछा-कहां है वह मुसलमान? पिता ने सामने बैठे शख्स की ओर इशारा किया। उसे देख मैं परेशानी में पड़ गया। मुसलमान तो ऐसा नहीं हो सकता। मैं तो सोचता था कि लंबे चौगे,दाढ़ी और सिर पर साफे के साथ लंबे कद और बड़ी आंखों वाले शख्स से मुलाकात होगी। इस शख्स के तो दाढ़ी भी नहीं थी। सच बात तो यह है कि उसके सिर पर भी बाल नहीं थे। उसने बड़ी गर्मजोशी और खुशी के साथ मेरा स्वागत किया और मेरे से हाथ मिलाया। मैं तो कुछ समझ नहीं पाया। मैं तो सोचता था कि ये लोग तो आतंकवादी और बम विस्फोट करने वाले होते हैं। मैं तो चक्कर में फंस गया।

मैंने सोचा चलो कोई बात नहीं,मैं इस शख्स पर अभी से काम शुरू कर देता हूं। शायद ईश्वर मेरे जरिए ही इसे नरक की आग से बचाना चाह रहा है। एक दूसरे से परिचय के बाद मैंने उससे पूछा- क्या आप ईश्वर में यकीन रखते हैं? उसने कहा-‘हां’। बहुत अच्छा, फिर मैंने पूछा-आप आदम और हव्वा में विश्वास रखते हैं? उसने कहा-‘हां’। मैंने आगे पूछा-और इब्राहीम के बारे में आपका क्या मानना है? क्या आप उनको मानते हैं? और यह भी कि उन्होंने अपने बेटे को कुरबान करने की कोशिश की? उसने फिर हां में जवाब दिया। इसके बाद मैंने उससे जाना-मूसा को भी मानते हो? उसने फिर हामी भरी। मेरा अगला सवाल था-अन्य पैगम्बरों-दाऊद, सुलेमान,जॉहन आदि को भी मानते हो? उसका जवाब फिर हां में था। मैंने जाना कि क्या तुम बाइबिल पर यकीन रखते हो? उसने हां कहा। अब मैं एक बड़े सवाल पर आया-क्या तुम ईसा को मानते हो? उसने कहा-हां।

   यह सब जानकर मुझे उस शख्स को ईसाई बनाने का काम आसान लग रहा था। मुझे लग रहा था,उसे तो अब सिर्फ बपतीशा की विधि की ही जरूरत है और यह काम मेरे जरिए होने वाला है। मैं इसे बड़ी उपलब्धि मान रहा था। एक मुसलमान हाथ में आना और इसे ईसाई धर्म स्वीकार करवाना बड़ा काम था। उसने मेरे साथ चाय पीने की हां भरी तो हम एक चाय की दुकान पर चाय पीने गए। हम वहां बैठकर अपने पसंद के विषय आस्था, विश्वास आदि पर बैठकर घंटों बातें करते रहे। ज्यादा बातें मैंने ही की। उससे बातचीत करने पर मुझे एहसास हुआ कि वह तो बहुत अच्छा आदमी है। वह कम ही बोलता था और शर्मीला भी था। उसने मेरी बात बड़ी तसल्ली से सुनी और बीच में एक बार भी नहीं बोला। मुझे उस शख्स का व्यवहार पसंद आया। मैंने मन ही मन सोचा-यह व्यक्ति तो बहुत अच्छा ईसाई बनने की काबिलियत रखता है। लेकिन भविष्य में क्या होने वाला है, इसकी मुझे थोड़ी सी भनक भी नहीं थी।

मैंने अपने पिता से सहमति जताई और उसके साथ बिजनेस करने के लिए राजी हो गया। मेरे पिता ने मुझे प्रोत्साहित किया और मेरे से कहा कि मैं उस मुस्लिम शख्स को अपने साथ बिजनेस ट्यूर पर उत्तरी टेक्सास ले जाऊं। लगातार कई दिनों तक हमने कार में सफर के दौरान अलग-अलग धर्म और आस्थाओं पर चर्चा की। मैंने उसे रेडियो पर आने वाले इबादत से जुड़े अपने पसंदीदा प्रोग्राम्स के बारे में बताया। मैंने बताया कि इन धार्मिक प्रोग्राम्स में सृष्टि की रचना का उद्देश्य,पैगम्बर और उनके मिशन और ईश्वर अपने मैसेज इंसानों तक कैसे पहुंचाता है, इसकी जानकारी दी जाती है। इन रेडियो प्रोग्राम्स के जरिए कमजोर और आम लोगों तक यह धार्मिक संदेश पहुंच जाते हैं। इस दौरान हम दोनों ने अपने धार्मिक विचार और अनुभवों को एक दूसरे के साथ बांटा।
   एक दिन मुझे पता चला कि मेरा यह मुस्लिम दोस्त मुहम्मद अपने मित्र के साथ जहां रह रहा था उस जगह को छोड़ चुका है और अब कुछ दिनों के लिए उसे मस्जिद में रहना पड़ेगा। मैं अपने पिता के पास गया और उनसे कहा कि क्यों न हम मुहम्मद को अपने बड़े घर में अपने साथ रख लें। वह अपने काम में भी हाथ बंटाएगा और अपने हिस्से का खर्चा भी अदा कर देगा। और जब कभी बिजनेस के सिलसिले में बाहर जाएंगे तो हमें हरदम तैयार मिलेगा। मेरे पिता को यह बात जम गई और फिर मुहम्मद हमारे साथ ही रहने लगा।

मैं टेक्सास में अपने साथी धर्मप्रचारकों से मिलने जाया करता था। उनमें से एक टेक्सास मैक्सिको सरहद तथा दूसरा ओकलहोमा सरहद पर रहता था। एक धर्मप्रचारक को तो बहुत बड़ा क्रॉस पसंद था जो उसकी कार से भी बड़ा था। वह उसे कंधे पर रखता और उसका सिरा जमीन पर घसीटते हुए चलता। जब वह उस क्रॉस को लेकर सड़क पर चलता तो कई लोग अपनी गाड़ी रोककर उससे पूछते-क्या चल रहा है? तो वह उन्हें ईसाई धर्म से जुड़ी किताबें और पम्फलेट देता। एक दिन मेरे इस क्रॉस वाले दोस्त को दिल का दौरा पड़ा और उसे हॉस्पिटल में लम्बे समय तक भर्ती रहना पड़ा। मैं हफ्ते में कई बार उस दोस्त से मिलने जाता। साथ में मैं अपने दोस्त मुहम्मद को भी ले जाता और इस बहाने हम अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं का आदान-प्रदान कर लेते। मेरे उस बीमार दोस्त पर इस्लाम का कोई असर नहीं पड़ा, इससे साफ जाहिर था कि इस्लाम के बारे में जानने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। एक दिन उसी अस्पताल में भर्ती एक मरीज व्हील चैयर पर मेरे दोस्त के कमरे में आया। मैं उसके नजदीक गया और मैंने उसका नाम पूछा। वह बोला-नाम कोई महत्वपूर्ण चीज नहीं है। मैंने उससे जाना कि वह कहां का रहने वाला है, तो वह चिड़कर बोला-मैं तो जूपीटर ग्रह से आया हूं। दरअसल वह अकेला था और अवसाद से पीडि़त था। इस वजह से मैं उसके सामने मालिक की गवाही देने की कोशिश करने लगा। मैंने उसे तौरात में से पैगम्बर यूनुस के बारे में पढ़कर सुनाया। मैंने बताया कि पैगम्बर यूनुस को ईश्वर ने लोगों को सीधी राह दिखाने के लिए भेजा था। यूनुस अपने लोगों को ईश्वर की सीधी राह दिखाने में विफल होकर उस बस्ती से निकल गए। इन लोगों से बचते हुए वे एक कश्ती में जाकर सवार हो गए। तूफान आया कश्ती भी टूटने लगी तो लोगों ने यूनुस को समंदर में फैंक दिया। एक व्हेल मछली पैगम्बर यूनुस को निगल गई। यूनुस मछली के पेट में समंदर में तीन दिन और तीन रात रहे। फिर जब यूनुस ने अपने गुनाह की माफी मांगी तो ईश्वर के आदेश से उस मछली ने उन्हें तट पर उगल दिया और वे अपने शहर निनेवा लौट आए। इस घटना में सबक यह था कि अपनी परेशानियों और बिगड़े हालात से भागना नहीं चाहिए। हम जानते हैं कि हमने क्या किया है और हमसे भी ज्यादा ईश्वर जानता है कि हमने क्या किया है।

इस वाकिए को सुनने के बाद व्हील चैयर पर बैठे उस शख्स ने ऊपर मेरी ओर देखा और मुझसे अपने किए व्यवहार की माफी मांगी। उसने कहा कि वह अपने रूखे व्यवहार से दुखी है और इन्हीं दिनों वह गम्भीर परेशानियों से गुजरा है। उसने कहा वह मेरे सामने अपने पाप कबूल करना चाहता है। मैंने उससे कहा मैं कैथोलिक पादरी नहीं हूं और मैं लोगों के पाप कबूल नहीं करवाता। वह बोला- ‘मैं यह बात जानता हूं। मैं खुद एक रोमन कैथोलिक पादरी हूं।’ यह सुनकर मैं भौंचक्का रह गया। क्या मैं एक पादरी को ही ईसाई धर्म के उपदेश दे रहा था? मैं सोच में पड़ गया आखिर इस दुनिया में यह क्या हो रहा है। उस पादरी ने अपनी कहानी सुनाई। उसने बताया कि मैक्सिको और न्यूयॉर्क में वह बारह साल तक ईसाई प्रचारक के रूप में काम कर चुका है और यहां उसका अनुभव पीड़ादायक रहा। अस्पताल से छुट्टी के बाद उस ईसाई पादरी को ऐसी जगह की जरूरत थी जहां वह तंदुरुस्ती हासिल कर सके। मैंने अपने पिता से कहा कि उसे अपने यहां रहने के लिए कहना चाहिए कि वह भी हमारे साथ रहे। हम इस पर सहमत हो गए और वह भी हमारे साथ रहने लगा। मेरी उस ईसाई पादरी से भी इस्लाम की धारणाओं और मान्यताओं पर बातचीत हुई तो उसने इस पर अपनी सहमति जताई। उसकी सहमति पर मुझे ताज्जुब हुआ। उस पादरी से मुझे यह जानकर भी हैरत हुई कि कैथोलिक पादरी इस्लाम का अध्ययन करते हैं और कुछ ने तो इस्लाम में डॉक्टरेट की उपाधि भी ले रखी है।
  हम हर शाम खाने के बाद टेबल पर बैठकर धर्म की चर्चा करते। चर्चा के दौरान मेरे पिता के पास किंग जेम्स की अधिकृत बाइबिल होती,मेरे पास बाइबिल का संशोधित स्टैडण्र्ड वर्जन होता, मेरी पत्नी के पास बाइबिल का तीसरा रूप और कैथोलिक पादरी के पास कैथोलिक बाइबिल, जिसमें प्रोटेस्टेंट बाइबिल से सात पुस्तकें ज्यादा है। हमारा वक्त इसमें गुजरता कि किसकी बाइबिल ज्यादा सत्य और सही है और फिर हम मुहम्मद को बाइबिल का संदेश देकर उसे ईसाई बनाने की कोशिश करते।

एक बार मैंने मुहम्मद से कुरआन के बारे में जाना कि पिछले चौदह सौ सालों में कुरआन के कितने रूप बन चुके हैं? उसने मुझे बताया कि कुरआन सिर्फ एक ही रूप में है और उसमें कभी कोई फेरबदल नहीं हुआ। उसने मुझे यह भी बताया कि कुरआन को दुनियाभर में लाखों लोग कंठस्थ याद करते हैं और कुरआन को जबानी याद रखने वाले लाखों लोग दुनियाभर में फैले हुए हैं। मुझे यह असंभव बात लगी। ऐसे कैसे हो सकता है? बाइबिल को देखो सैकड़ों सालों से इसकी मौलिक भाषा ही मर गई। सैंकड़ों साल के काल में इसकी मूल प्रति ही खो गई। फिर भला ऐसे कैसे हो सकता है कि कुरआन असली रूप में अभी भी मौजूद हो।

   एक बार हमारे घर रह रहे कैथोलिक पादरी ने मुहम्मद से कहा कि वह उसके साथ मस्जिद जाना चाहता है और देखना चाहता है कि मस्जिद कैसी होती है। एक दिन वे दोनों मस्जिद गए। वापस आए तो वे मस्जिद के अपने अनुभव बांट रहे थे। हम भी पादरी से पूछे बगैर नहीं रह सके कि मस्जिद कैसी थी और वहां क्या-क्या विधियां कराई गईं? पादरी ने जवाब दिया-ऐसा कुछ नहीं किया गया जैसा तुम समझ रहे हो। मुस्लिम आए,नमाज पढ़ी और चले गए। ‘चले गए,ऐसे ही चले गए? बिना कोई भाषण और गाने के ही चले गए?’ उसने कहा-हां,ऐसा ही था उनकी इबादत का तरीका।

  कुछ दिन और गुजरने के बाद एक दिन कैथोलिक पादरी ने मुहम्मद से कहा कि वह एक बार और उसके साथ मस्जिद जाना चाहता है। लेकिन इस बार तो कुछ अलग ही हुआ। वे काफी देर तक घर नहीं लौटे। अंधेरा हो गया तो हमें उनकी चिंता होने लगी। कहीं उनके साथ कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई है? वे दोनों आए, दरवाजे में मैंने मुहम्मद को तो पहचान लिया लेकिन साथ आने वाले को एकदम से नहीं पहचान पाया। वह सफेद लंबा चौगा और सिर पर सफेद टोपी लगाए था। अरे,यह तो पादरी है? मैंने उससे पूछा-‘पेटे, क्या तुम मुसलमान बन गए हो?’ उसने कहा-हां, आज मैंने इस्लाम अपना लिया है।


क्या एक पादरी मुसलमान बन गया?

   इसके बाद मैं ऊपर के कमरे में गया और इस मुद्दे पर अपनी पत्नी से बात की। मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि वह भी जल्दी ही इस्लाम अपनाने जा रही है, क्योंकि वह इस नतीजे पर पहुंची है कि इस्लाम सच्चा धर्म है। यह जानकर मुझे तगड़ा झटका लगा। मैंने नीचे आकर मुहम्मद को जगाया और उसे बाहर आकर मेरे साथ चर्चा करने को कहा। हम दोनों रात भर टहलते रहे और इस्लाम पर चर्चा करते रहे। फज्र की नमाज का वक्त हो गया था। अब तक मैं जान चुका था कि इस्लाम सत्य है और अब मुझे इस मामले में अपनी भूमिका निभानी है। मैं पीछे की तरफ अपने पिता के घर गया। वहां एक पलाई का टुकड़ा पड़ा था। मैंने उसी पलाई के टुकड़े पर अपना माथा रख दिया। मेरा मुंह उस दिशा में था जिस तरफ मुंह करके मुसलमान नमाज पढ़ते हैं। मेरा बदन पलाई पर फैला था और मेरा ललाट जमीन पर टिका था। मैंने उसी स्थिति में सच्चे ईश्वर से प्रार्थना की- ‘है ईश्वर अगर तुम यहां है तो मेरा मार्गदर्शन कर, मुझे सच्ची राह पर ले चल।’ थोड़ी देर बाद मैंने अपना सिर उठाया तो मैंने कुछ खास महसूस किया। नहीं,नहीं मैंने चिडिय़ा या फरिश्तों को आसमान से आते हुए नहीं देखा। ना मैंने किसी तरह की आवाज सुनी और ना कोई संगीत। ना ही मैंने कोई तेज रोशनी देखी या रोशनी की कोई झलक। जो कुछ मैंने महसूस किया वह था मेरे अंदर हुआ बदलाव। मैंने खुद के अंदर बदलाव महसूस किया। अब मैं ज्यादा जागरूक हो गया था कि अब समय आ गया है कि मैं झूठ बोलना, धोखा देना और झूठ पर आधारित बिजनेस बंद कर दूं। अब समय आ गया है कि मैं अपने आपको सीधा, नेक और ईमानदार इंसान बनाने के काम में लग जाऊं। अब मेरी समझ में आ गया था कि मुझे अब क्या करना है। मैं ऊपर गया और फंव्वारे के नीचे बैठ नहाने लगा, इस सोच के साथ कि अब मैं अपने पुराने सभी गुनाह धो रहा हूं। और अब एक नई जिंदगी में दाखिल हो रहा हूं। एक ऐसी जिंदगी जिसका आधार सच्चाई है और जिसे किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। सुबह ग्यारह बजे दो गवाहों एक पूर्व पादरी फादर पीटर जेकब (जो अब मुसलमान हो चुका था) और मुहम्मद अब्दुल रहमान की उपस्थिति में मैंने इस्लाम का कलमा ए शहादत पढ़ लिया। खुली गवाही दी कि अल्लाह एक ही है और मुहम्मद(स.अ.व.)अल्लाह के पैगम्बर हैं। कुछ देर बाद ही मेरी पत्नी ने भी इस्लाम का कलमा पढ़ लिया। उसने तीन गवाहों के सामने कलमा पढ़ा। तीसरा मैं था।
  मेरे पिता थोड़े संकोची स्वभाव के थे, इस वजह से उन्होंने कुछ महीने बाद इस्लाम कबूल किया लेकिन उसके बाद उन्होंने अपनी सारी ताकत और सामथ्र्य इस्लाम के लिए लगा दी। फिर तो हम अन्य मुसलमानों के साथ स्थानीय मस्जिद में नमाज अदा करने लगे।
  मैंने बच्चों को भी ईसाई स्कूलों से हटाकर मुस्लिम स्कूलों में दाखिल करा दिया। इन दस सालों में बच्चे कुरआन और इस्लामी शिक्षा को याद करने में जुटे हैं।
 सबसे बाद में मेरे पिता की पत्नी (मेरी सौतेली मां) ने इस बात को स्वीकार किया कि ईसा ईश्वर का बेटा नहीं हो सकता। ईसा तो ईश्वर का पैगम्बर था, ईश्वर नहीं था।

   अब आप थोड़ा गौर करें और सोचें कि कैसे अलग-अलग पृष्ठभूमियों और पंथ वालों ने सत्य को अपनाया और यह जानने की कोशिश की कि किस तरह सृष्टि के रचयिता और अपने पालनहार को जाना जाए। आप जरा सोचिए तो सही। एक कैथोलिक पादरी। एक चर्च संगीतकार और पादरी। एक अधिकृत पादरी और ईसाई स्कूलों का संस्थापक। सब एक साथ मुसलमान हो गए। यह तो ईश्वर की मेहरबानी ही है कि हमारी आंखों से परदा हटा और इस्लाम रूपी सत्य को देखने के लिए ईश्वर ने हमारा मार्गदर्शन किया।

   अगर मैं अपने जीवन की कहानी को यहीं पूरी कर दूं तो आपको लगेगा कि यह कहानी तो चकित करने वाली है। आश्चर्य वाली बात ही है कि तीन अलग-अलग पंथों के पादरियों ने अपने धर्म के एकदम खिलाफ माने जाने वाली मान्यताओं और विचारों को अपनाया। और उन्होंने ही नहीं बाद में उनके परिवार वालों ने भी इस्लाम अपनाया।

    लेकिन बात अभी पूरी नहीं हुई। और भी है। उसी साल मैं टेक्सास के ग्रांड प्रेयरी स्थान पर था। वहां पर मेरी मुलाकात जोय नाम के बेपटिस्ट सेमीनारी के एक विद्यार्थी से हुई जिसने पादरियों को शिक्षा देने वाली संस्था सेमीनारी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कुरआन का अध्ययन किया और इस्लाम अपना लिया। और भी कई ऐसे लोग हैं। मुझे एक और कैथोलिक पादरी याद आ रहा है जो इस्लाम की अच्छाइयां इतनी ज्यादा बयान करता था कि एक दिन मैं उससे पूछ बैठा-आप इस्लाम में दाखिल क्यों नहीं हो जाते? उसका जवाब था-क्या? मैं अपनी नौकरी खो दूं? उसका नाम है-फादर जॉन और मुझे अब भी उससे उम्मीद है। इसी साल मेरी एक और पूर्व कैथोलिक पादरी से मुलाकात हुई जो पिछले आठ सालों से अफ्रीका में ईसाई धर्म प्रचारक था। उसने इस्लाम के बारे में वहीं सीखा और फिर इस्लाम कबूल कर लिया। उसने अपना नाम उमर रखा और अभी वह डलास टैक्सास में रहता है।

   इस्लाम अपनाने के बाद जब मैं एक प्रचारक के रूप में दुनियाभर में घूमा तो मेरी कई राजनीतिज्ञ, प्रोफेसर,दूसरे धर्मों के विद्वान और वैज्ञानिकों से मुलाकात हुई जिन्होंने इस्लाम धर्म का अध्ययन किया और फिर मुसलमान हो गए। इन लोगों में यहूदी,हिंदू,कैथोलक,प्रोटेस्टेंट,जहोवाज,विटनेसेस,ग्रीक और रसियन रूढि़वादी चर्च,मिश्र के कॉप्टिक ईसाई और नास्तिक लोग शामिल हैं।

जो शख्स सच की तलाश में है उसे इन नौ बातों पर गौर करना चाहिए-

अपने दिल,दिमाग और आत्मा को वास्तविक भलाई के लिए पवित्र करो। साफ रखो।

हर तरह के पूर्वाग्रह और भेदभाव को अपने दिल और दिमाग से निकाल दो।

जो भाषा आप अच्छी तरह से जानते हैं उस भाषा में अनुवादक किया गया कुरआन पढ़ो।

 थोड़ा रुको,ठहरो।

5   गौर फिक्र-चिंतन करो।

  सोचो और ईश्वर से प्रार्थना करो।

7   जिस सर्वशक्तिमान ने आपको बनाया है, उससे दिल से प्रार्थना करो कि वह आपको सत्य तक पहुंचाने में आपका मार्गदर्शन करे। आपको सच्ची राह दिखाए।

8  कुछ महीनों तक इस अभ्यास को जारी रखें और नियमानुसार इसे रोजाना करें।

  जब आपको लगे कि आपकी आत्मा एक नए रूप में करवट ले रही है। आपको लगे मानो आप एक नए रूप में जन्म ले रहे हैं तो ऐसे में ऐसे लोगों से बचें जिनकी सोच में जहर भरा हो जो आपको गुमराह कर सकते हैं।

   अब आपका मामला आपके और इस ब्रह्माण्ड के सर्वशक्तिमान मालिक के बीच है। अगर आप वाकई में सच्चे ईश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं तो वह इस बात से अंजान नहीं है क्योंकि वह तो दिलों तक की बात जानने वाला है। और वह उसी हिसाब से आपका मामला तय करेगा जो आपके दिल में है।

   ईश्वर से दुआ है कि वह आपको सच्ची राह दिखाने में आपका मार्गदर्शन करे। वह इस जगत की सच्चाई और जिंदगी का मकसद जानने के लिए आपके दिल और दिमाग को खोले। आमीन



                                                                                                  आपका दोस्त

                                                                                                        यूसुफ एस्टीज

                              यूसुफ एस्टीज की ऑफिसियल वेबसाइट-http://www.islamtomorrow.com/

सेठ रामजी लाल गुप्ता अब "सेठ मुहम्मद उमर"

Posted by इस्लामिक वेबदुनिया on 09:10
बाबरी मस्जिद शहीद करने के लिए अपने लाखों रुपये खर्च करने वाला सेठ आख़िर खुद मुसलमान क्यो हो गया?
जाहिर है आप यह बात ज़रूर जानना चाहेंगें .तो फिर पढ़िए यह इंटरव्यू.....

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम रहमतुल्लाहि व बरकातुह

सेठ मुहम्मद उमरः मौलवी साहब व अलैकुमुस्सलाम

अहमदः सेठ साहब, दो तीन महीने से अबी(मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) आपका बहुत जिक्र कर रहे हैं, अपनी तकरीरों में आप का जिक्र करते हैं और मुसलमानों को डराते हैं कि अल्लाह तआला अपने बन्दों की हिदायत के लिये हर चीज से काम लेने पर कादिर हैं।
सेठ उमरः मौलवी साहब, हजरत साहब बिल्कुल सच कहते हैं, मेरी जिन्दगी खुद अल्लाह की दया व करम की खुली निशानी है, कहाँ मुझ जैसा, खुदा और खुदा के घर का दुश्मन और कहाँ मेरे मालिक का मुझ पर करम। काश! कुछ पहले मेरी हजरत साहब या हजरत के किसी आदमी से मुलाकात हो जाती तो मेरा लाडला बेटा ईमान के बगैर न मरता, (रोने लगते हैं और बहुत देर तक रोते रहते हैं, रोते हुये) मुझे कितना समझाता था और मुसलमानों से कैसा ताल्लुक रखता था वह और ईमान के बगैर मुझे बुढापे में अपनी मौत का गम दे कर चला गया।
अहमदः सेठ साहब, पहले आप अपना खानदानी परिचय(तआरूफ) कराईये।
सेठ उमरः मैं लखनऊ के करीब एक कस्बे के ताजिर खानदान में पहली बार अब से 69 साल पहले 6 दिसम्बर 1939 में पैदा हुआ, गुप्ता हमारी गौत है, मेरे पिताजी किराना की थोक की दुकान करते थे, हमारी छटी पीढी से हर एक के यहाँ एक ही औलाद होती आयी है, मैं अपने पिताजी का अकेला बेटा था, नवीं क्लास तक पढ़ कर दुकान पर लग गया, मेरा नाम रामजी लाल गुप्ता मेरे पिताजी ने रखा।
अहमदः पहली मर्तबा 6 दिसंबर को पैदा हुये तो क्या मतलब है?
सेठ उमरः अब दोबारा असल में इसी साल 22 जनवरी को चन्द महीने पहले मैं ने दोबारा जन्म लिया और सच्ची बात यह है कि पैदा तो में अभी हुआ, पहले जीवन को अगर गिनें ही नहीं तो अच्छा है, वह तो अन्धेरा ही अन्धेरा है।
अहमदः जी! तो आप खानदानी तआरूफ करा रहे थे?
सेठ उमरः घर का माहौल बहुत धार्मिक (मजहबी) था, हमारे पिताजी जिले के बी. जे. पी. जो पहले जनसंघ थी, के जिम्मेदार थे, उसकी वजह से इस्लाम और मुस्लिम दुश्मनी हमारे घर की पहचान थी और यह मुस्लिम दुश्मनी जैसे घुट्टी में पडी थी। 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने से लेकर बाबरी मस्जिद की शहादत के घिनावने जुर्म तक में इस पूरी तहरीक में आखरी दरजे के जुनून के साथ शरीक रहा, मेरी शादी एक बहुत भले और सेक्यूलर खानदान में हुई, मेरी बीवी का मिजाज़ भी इसी तरह का था और मुसलमानों से उनके घरवालों के बिल्कुल घरेलू ताल्लुकात थे। मेरी बारात गयी, तो सारे खाने और शादी का इन्तजशम हमारे ससुर के एक दोस्त खाँ साहब ने किया था और दसयों दाढ़ियों वाले वहाँ इन्तज़ाम में थे जो हम लोगों को बहुत बुरा लगा था और मैं ने एक बार तो खाना खाने से इन्कार कर दिया था कि खाने में इन मुसलमानों का हाथ लगा है, हम नहीं खायेंगे मगर बाद में मेरे पिताजी के एक दोस्त पण्डित जी उन्होंने समझाया कि हिन्दू धर्म में कहाँ आया है कि मुसलमानों के हाथ लगा खाना नहीं खाना चाहिये। बडी कराहियत के साथ बात न बढाने के लिये मैं ने खाना खा लिया। 1952 में मेरी शादी हुयी थी, नौ साल तक हमारे कोई औलाद नहीं हुई, नो साल के बाद मालिक ने 1961 में एक बेटा दिया, उसका नाम मैं ने योगेश रखा, उसको मैं ने पढाया और अच्छे से स्कूल में दाखिल कराया और इस ख्याल से कि पार्टी और कोम के नाम इसको अर्पित (वक्फ) करूँगा, उसको समाज शास्त्र में पी. एच. डी कराया। शुरू से आखिर तक वह टापर रहा मगर उसका मिजाज़ अपनी माँ के असर में रहा और हमेशा हिन्दूओं के मुकाबले मुसलमानों की तरफ माइल रहता। फिर्केवाराना मिजाज़ से उसको अलर्जी थी, मुझ से बहुत अदब करने के बावजूद इस सिलसिले में बहस कर लेता था। दो बार वह एक-एक हफ्ते के लिये मेरे राम मन्दिर तहरीक में जुडने और उस पर खर्च करने से नाराज़ हो कर घर छोड कर चला गया, उसकी माँ ने फोन पर रो-रो कर उसको बुलाया।
अहमदः अपने कबुले इस्लाम के बारे में जरा तफसील से बताईये?
सेठ उमरः मुसलमानों को मैं इस मुल्क पर आक्रमण (हमला) करने वाला मानता था। या फिर मुझे राम-जन्म भूमि मन्दिर को गिरा कर मस्जिद बनाने की वजह से बहुत चिढ़ थी और मैं हर कीमत पर यहाँ राम मन्दिर बनाना चाहता था, इसके लिये मैं ने तन, मन, धन सब कुछ लगाया। 1987 से लेकर 2005 तक राम मन्दिर आन्दोलन और बाबरी मस्जिद गिराने वाले कारसेवकों पर विश्व हिन्दू परिषद को चन्दे में कुल मिला कर 25 लाख रूपये अपनी ज़ाती कमायी से खर्च किये। मेरी बीवी और योगेश इस पर नाराज़ भी हुये। योगेश कहता था इस देश पर तीन तरह के लोग आकर बाहर से राज करते आये, एक तो आर्यन आये उन्होंने इस देश में आकर जुल्म किया, यहाँ के शुद्रों को दास बनाया और अपनी साख बनायी, देश के लिये कोई काम नहीं किया, आखरी दरजे में अत्याचार (जुल्म) किये, कितने लोगों को मौत के घाट उतारा, तीसरे अंग्रेज आये उन्होंने भी यहाँ के लोगों को गुलाम बनाया, यहाँ का सोना, चाँदी, हीरे इंगलैण्ड ले गये, हद दरजे अत्याचार किये, कितने लोगों को मारा कत्ल किया, कितने लागों का फाँसी लगायी।
दूसरे नम्बर पर मुसलमान आये, उन्होंने इस देश को अपना देश समझ कर यहाँ लाल किले बनाये, ताज महल जैसा देश के गौरव का पात्र (काबिले फखर इमारत) बनायी, यहाँ के लोगों को कपडा पहनना सिखाया, बोलना सिखाया, यहाँ पर सडकें बनवायीं, सराएँ बनवायीं, खसरा खतोनी डाक का निजाम और आब-पाशी का निजाम बनाया, नहरे निकालीं और देश में छोटी-छोटी रियास्तों को एक करके एक बडा भारत बनाया। एक हजार साल अल्प-संख्या (अकल्लियत) में रह कर अक्सरियत पर हुकूमत की और उनको मजहब की आज़ादी दी, वह मुझे तारीख के हवालों से मुसलमान बादशाहों के इन्साफ के किस्से दिखाता, मगर मेरी घूट्टी में इस्लाम दुश्मनी थी वह न बदली।
30 दिसम्बर 1990 में भी मैं ने बढ-चढ कर हिस्सा लिया और 6 दिसम्बर 1992 में तो मैं खुद अयोध्या गया, मेरे जिम्मे एक पूरी टीम की कमान थी, बाबरी मस्जिद शहीद हुयी तो मैं ने घर आकर एक बडी दावत की, मेरा बेटा योगेश घर से नाराज़ होकर चला गया, मैं ने खूब धूम-धाम से जीत की तकरीब मनायी। राम मन्दिर के बनाने के लिये दिल खोल कर खर्च किया, मगर अन्दर से एक अजीब सा डर मेरे दिल में बैठ गया और बार-बार ऐसा ख्याल होता था कोई आसमानी आफत मुझ पर आने वाली है। 6 दिसम्बर 1993 आया तो सुबह मेरी दुकान और गोदाम मैं जो फासले पर थे बिलजी का तार शार्ट होने से दोनों में आग लग गयी और तकरीबन दस लाख रूपये से ज्यादा का माल जल गया। उसके बाद से तो और भी ज्यादा दिल सहम गया। हर 6 दिसम्बर को हमारा पूरा परिवार सहमा सा रहता था और कुछ न कुछ हो भी जाता था। 6 दिसम्बर 2005 को योगेश एक काम के लिये लखनऊ जा रहा था उसकी गाडी एक ट्रक से टकरायी और मेरा बेटा और ड्राईवर मौके पर इन्तकाल कर गये। उस का 9 साल का नन्हा सा बच्चा और 6 साल की एक बेटी है। यह हादसा मेरे लिये नाकाबिले बरदाश्त था और मेरा दिमागी तवाजुन खराब हो गया। कारोबार छोड कर दर-बदर मारा-मारा फिरा। बीवी मुझे बहुत से मौलाना लोगों को दिखाने ले गयी, हरदोई में बडे हजरत साहब के मदरसे में ले गयी, वहाँ पर बिहार के एक कारी साहब हैं, तो कुछ होश तो ठीक हुये, मगर मेरे दिल में यह बात बैठ गयी कि मैं गलत रास्ते पर हूँ, मुझे इस्लाम को पढना चाहिये इस्लाम पढना शुरू किया।

अहमदः इस्लाम के लिये आपने क्या पढा?
सेठ उमरः मैं ने सब से पहले हजरत मुहम्मद सल्ल. की एक छोटी सीरत पढ़ी, उसके बाद ‘इस्लाम क्या है?’ पढी। ‘इस्लाम एक परिचय’ मौलाना अली मियाँ की पढी। 5 दिसम्बर 2006 को मुझे हजरत साहब की छोटी सी किताब ‘आप की अमानत -आपकी सेवा में’ एक लडके ने लाकर दी। 6 दिसंबर अगले रोज थी, मैं डर रहा था कि अब कल को किया हादसा होगा, उस किताब ने मेरे दिल में यह बात डाली कि मुसलमान होकर इस खतरे से जान बच सकती है और में 5 दिसंबर की शाम को पाँच छ लोगों के पास गया मुझे मुसलमान कर लो, मगर लोग डरते रहे, कोई आदमी मुझे मुसलमान करने का तैयार न हुआ।
अहमदः आप 6 दिसम्बर 2006 को मुसलमान हो गये थे, आप तो अभी फरमा रहे थे कि चन्द महीने पहले 22 जनवरी 2009 को आप मुसलमान हुये।
मुहम्मद उमरः मैं ने 5 दिसम्बर 2006 को मुसलमान होने का पक्का इरादा कर लिया था, मगर 22 जनवरी को इस साल तक मुझे कोई मुसलमान करने को तैयार नहीं था, हजरत साहब को एक लडके ने जो हमारे यहाँ से जाकर फुलत मुसलमान हुआ था बताया कि एक लाला जी जो बाबरी मस्जिद की शहादत में बहुत खर्च करते थे मुसलमान होना चाहते हैं, तो हजरत ने एक मास्टर साहब को (जो खुद बाबरी मस्जिद की शहादत में सब से पहले कुदाल चलाने वाले थे) भेजा, वह पता ठीक न मालूम होने की वजह से तीन दिन तक धक्के खाते रहे, तीन दिन के बाद 22 जनवरी को वह मुझे मिले और उन्होंने मुझे कलमा पढवाया और हजरत साहब का सलाम भी पहुँचाया, सुबह से शाम तक वह हजरत साहब से फोन पर बात कराने की कोशिश करते रहे मगर हजरत महाराष्ट्र के सफर पर थे, शाम को किसी साथी के फोन पर बडी मुश्किल से बात हुयी। मास्टर साहब ने बताया कि सेठ जी से मुलाकात हो गयी है और अल्हम्दु लिल्लाह उन्होंने कलमा पढ लिया है, आप से बात करना चाहते हैं और आप इन्हें दोबारा कल्मा पढवा दें, हजरत साहब ने मुझे दोबारा कल्मा पढवा दिया और हिन्दी में भी अहद(वचन, वादा) करवाया।
मैं ने जब हजरत साहब से अर्ज किया कि हजरत साहब! मुझ जालिम ने अपने प्यारे मालिक के घर को ढाने और उसकी जगह शिर्क(अनेकश्वरवाद) का घर बनाने में अपनी कमायी से 25 लाख रूपये खर्च किये हैं, अब मैं ने इस गुनाह की माफी के लिये इरादा किया है कि 25 लाख रूपये से एक मस्जिद और मदरसा बनवाऊँगा आप अल्लाह से दुआ किजिये कि जब उस करीम मालिक ने अपने घर को गिराने और शहीद करने को मेरे लिये हिदायत का जरिया बना दिया है तो मालिक मेरा नाम भी अपना घर ढाने वालों की फहरिस्त से निकाल कर अपना घर बनाने वालों में लिख लें और मेरा कोई इस्लामी नाम भी आप रख दिजिये, हजरत साहब ने फोन पर बहुत मुबारक बाद दी और दुआ भी की और मेरा नाम मुहम्मद उमर रखा, मेरे मालिक का मुझ पर कैसा अहसान हुआ, मौलवी साहब अगर मेरा रवाँ-रवाँ, मेरी जान, मेरा माल सब कुछ मालिक के नाम पर कुरबान हो जाये तो भी इस मालिक का शुक्र कैसे अदा हो सकता है कि मेरे मालिक ने मेरे इतने बडे जुल्म और पाप को हिदायत का जरिया बना दिया।
अहमदः आगे इस्लाम को पढने वगैरा के लिये आपने क्या किया?
सेठ उमरः मैंने अल्हम्दु लिल्लाह घर पर टयूशन लगाया है, एक बडे नेक मौलाना साहब मुझे मिल गये हैं वह मुझे कुरआन भी पढा रहे हैं समझा भी रहे हैं।
अहमदः आप की बीवी और पोते-पोती का कया हुआ?
सेठ उमरः मेरे मालिक का करम है कि मेरी बीवी, योगेश की बीवी और दोनों बच्चे मुसलमान हो गये हैं और हम सभी साथ में पढते हैं।

अहमदः आप यहाँ दिल्ली किसी काम से आये थे?
सेठ उमरः नहीं सिर्फ मौलाना ने बुलाया था, एक साहब मुझे लेने के लिये गये थे, हजरत साहब से मिलने का बहुत शौक था, बारहा(अकसर) फोन करता था मगर मालूम होता था कि सफर पर हैं, अल्लाह ने मुलाकात करा दी, बहुत ही तसल्ली हुयी।

अहमदः अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) से और क्या बातें हुयीं?
सेठ उमरः हजरत साहब ने मुझे तवज्जेह दिलायी कि आपकी तरह कितने हमारे खूनी रिश्ते के भाई बाबरी मस्जिद की शहादत में गलतफहमी में शरीक रहे, आपको चाहिये कि उन पर काम करें। उन तक सच्चाई को पहुँचाने का इरादा तो करें, मैं ने अपने ज हन से एक फहरिस्त बनायी है, अब मेरी सहत इस लायक नहीं कि मैं कोई भाग दौड करूँ मगर जितना दम है वह तो अल्लाह का और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कलमा उसके बन्दों तक पहुँचाने में लगना चाहिये।

अहमदः मुसलमानों के लिये कोई पैगाम आप देगें?
सेठ मुहम्मद उमरः मेरे योगेश का ग़म मुझे हर लम्हे सताता है, मरना तो हर एक को है, मौलवी साहब! मौत तो वक्त पर आती है और बहाना भी पहले से तै है मगर ईमान के बगैर मेरा ऐसा प्यारा बच्चा जो मुझ जैसे जालिम और इस्लाम दुश्मन बल्कि खुदा दुश्मन के घर पैदा होकर सिर्फ मुसलमानों का दम भरता हो वह इस्लाम के बगैर मर गया, इसमें मुसलमानों के हक अदा न करने का अहसास मेरे दिल का ऐसा ज़ख्‍म है जो मुझे खाये जा जा रहा है, ऐसे न जाने कितने जवान, बूढे, मौत की तरफ जा रहे हैं उनकी खबर लें।
अहमदः बहुत-बहुत शुक्रिया सेठ उमर साहब! अल्लाह तआला आपको बहुत-बहुत मुबारक फरमाये, योगेश के सिलसिले में तो अबी ऐसे लोगों के बारे में कहते हैं कि फितरते इस्लामी पर रहने वाले लोगों को मरते वक्त फरिश्ते कलमा पढ़वा देते हैं, ऐसे वाकिआत ज़ाहिर भी हुये हैं, आप अल्लाह की रहमत से यही उम्मीद रखें, योगेश मुसलमान होकर ही मरे हैं।
मुहम्मद उमरः अल्लाह तआला आपकी जबान मुबारक करे, मौलवी अहमद साहब! अल्लाह करे ऐसा ही हो, मेरा फूल सा बच्चा मुझे जन्नत में मिल जाये।
अहमदः आमीन, सुम्मा आमीन, इन्शा अल्लाह जरूर मिलेगा, अस्सलामु अलैकुम
सेठ मुहम्मद उमरः व अलैकुमुस्सलाम

   (साभारः मासिक ‘अरमुगान’ फुलत, जून 2009)

बाबरी मस्जिद ढहाने वाला शिवसैनिक मुसलमान बन गया

Posted by इस्लामिक वेबदुनिया on 09:15


बाबरी मस्जिद पर पहली कुदाल चलाने वाले बलबीर सिंह के दिल पर ऐसी कुदाल चली कि वह खुद इस्लाम की शरण में आ गया। बन गया बलबीर सिंह से मुहम्मद आमिर। आखिर ऐसा क्यों हुआ? खुद जान लीजिए उनके इस इन्टरव्यू में।

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम

मास्टर मुहम्मद आमिरः व अलैकुमुस्सलाम

अहमदः मास्टर साहब। एक अरसे से अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी) का हुक्म था कि ‘अरमुगान’ (मासिक पत्रिका) के लिए आप से इण्टरव्यू लूँ, अच्छा हुआ आप खुद ही तशरीफ ले आए, आपसे कुछ बातें करनी हैं।

आमिरः अहमद भाई! आपने मेरे दिल की बात कही। जब से ‘अरमुगान’ में नव-मुस्लिमों के इण्टरव्यू का सिलसिला चल रहा है। मेरी ख्वाहिश(इच्छा) थी कि मेरे कुबूले इस्लाम का हाल उस में छपे। इस लिए नहीं कि मेरा नाम ‘अरमुगान’ में आये बल्कि इस लिए कि दावत का काम करने वालों को हौसला बढे और दुनिया के सामने करीम व हादी (कृपालू व सण्मार्ग-प्रदर्शक) रब की करम फरमाई की एक मिसाल सामने आये और दावत का काम करने वालों को यह मालूम हो कि जब ऐसे कमीने इन्सान और अपने मुबारक घर को ढाने वाले को अल्लाह तआला हिदायत (पथ-प्रदर्शन, निर्देश) से नवाज़ सकते हैं तो आम शरीफ और भोले भाले लोगों के लिए हिदायत (पथ-प्रदर्शन) के कैसे मवाके (अवसर) हैं।

अहमदः आप अपना खानदानी तआरुफ(परिचय) कराएँ।

आमिरः मेरा तअल्लुक सूबा हरियाणा के पानीपत जिले के एक गाँव से है, मेरी पैदाईश 6 दिसम्बर 1970 को एक राजपूत घराने में हुयी, मेरे वालिद साहब (पिताजी) एक अच्छे किसान होने के साथ-साथ एक प्राइमरी स्कूल में हेडमास्टर थे। वह बहुत अच्छे इन्सान थे और इन्सानियत दोस्ती उनका मज़हब था। किसी पर भी किसी तरह के जुल्म से उन्हें सख्त चिढ थी। सन 47 के फसादात उन्होंने अपनी आँखों से देखे थे। वह बहुत कर्ब(तकलीफ) के साथ उनका जिक्र करते थे और मुसलमानों के कत्लेआम को मुल्क पर बडा दाग समझते थे। बचे-खुचे मुसलमानों को बसाने में वह बहुत मदद करते थे। मेरा पैदाईशी नाम बलबीर सिंह था। अपने गाँव के स्कूल में मैं ने हाइस्कूल करके इंटरमीडीएट में, पानीपत में दाखिला लिया। पानीपत शायद मुम्बई के बाद शिवसेना का सबसे मजबूत गढ है। खास तौर पर जवान तब्का और स्कूल के लोग शिव सेना में बहुत लगे हुये हैं।
वहाँ मेरी दोस्ती कुछ शिवसैनिकों से हो गयी और मैंने भी पानीपत शाखा में नाम लिखा लिया। पानीपत के इतिहास के हवाले से वहाँ नौजवानों में मुसलमानों खास तौर पर और दूसरे मुसलमान बादशाहों के खिलाफ बडी नफरत घोली जा रही थी। मेरे वालिद साहब को मेरे बारे में मालूम हुआ कि मैं शिवसेना में शामिल हो गया हूँ तो उन्होंने मुझे बहुत समझाया, उन्होंने मुझे इतिहास के हवाले से समझाने की कोशिश की और उन्होंने ‘बाबर’ खास तौर पर औरंगजेब के हुकूमत के इन्साफ और गैरमुस्लिमों के साथ उनके उमदा सुलूक (अच्छा व्यवहार) के किस्से सुनाये और मुझे बताने की कोशिश की कि अंग्रेजों ने गलत तारीख(इतिहास) हमें लडाने के लिये और देश को कमजोर करने के लिये घड कर तैयार की है, उन्होंने 1947 के ज़ुल्म और कत्ल गारत के किस्सों के हवाले से मुझे शिव सेना से बाज (दूर) रखने की कोशिश की, मगर मेरी समझ में कुछ न आया।
अहमदः आपने फुलत के क्याम(संस्थापन) के दौरान बाबरी मस्जिद की शहादत में अपनी शिर्कत का किस्सा सुनाया था, जरा अब दोबारा तफसील से सुनाईये।

आमिरः वह किस्सा इस तरह है कि 1990 में आडवाणी जी की रथ-यात्रा में मुझे पानीपत के प्रोग्राम की खासी बडी जिम्मेदारी सोंपी गयी, रथ यात्रा में उन जिम्मेदारियों ने हमारे रोयें-रोयें में मुस्लिम नफरत की आग भर दी। मैं ने शिवा जी की सौगंध खायी कि कोई कुछ भी करे मैं खुद अकेले जाकर राम मन्दिर पर से उस जालिमाना ढांचे को मस्मार (ध्वस्त) कर दूंगा, उस यात्रा में मेरी कारकर्दगी(कर्मण्यता, प्रफॉर्मेन्स) की वजह से मुझे शिवसेना यूथ विंग का सदर(अध्यक्ष) बना दिया गया, मैं अपनी नौजवान टीम को लेकर 30 अक्तूबर को अयोध्या गया, रास्ते में हमें पुलिस ने फेजाबाद में रोक दिया, मैं और कुछ साथी किसी तरह बच-बचाकर फिर भी अयोध्या पहुँचे मगर पहुँचने में देर हो गयी और उस से पहले गोली चल चुकी थी और बहुत कोशिश के बावजूद मैं बाबरी मस्जिद के पास न पहुँच सका मेरी नफरत की आग उससे और भडकी मैं अपने साथियों से बार-बार कहता था। इस जीवन से मर जाना बहतर है।
राम के देश में अरब लुटेरों की वजह से राम के भगतों पर राम-जन्म भूमि पर गोली चला दी जाये, यह कैसा अन्याय और जुल्म है, मुझे बहुत गुस्सा था, कभी ख्याल होता था कि खुदकशी कर लूँ कभी दिल में आता था कि लखनऊ जाकर मुलायम सिंह के अपने हाथ से गोली मार दूँ, मुल्क में फसादात चलते रहे और मैं उस दिन की वजह से बेचैन था कि मुझे मौका मिले और मैं बाबरी मस्जिद को अपने हाथों मसमार(ध्वस्त) करूं। एक-एक दिन करके वह मनहूस दिन करीब आया जिसे मैं उस वक्त खुशी का दिन समझता था। मैं अपने कुछ जज्बाती साथियों के साथ एक दिसम्बर 1992 को पहले अयोध्या पहुँचा, मरे साथ सोनीपत के पास एक जाटों के गाँव का एक नौजवान योगेन्द्रपाल भी था जो मेरा सबसे करीबी दोस्त था। उसके वालिद एक बडे ज़मींदार थे और वह भी बडे इन्सान दोस्त आदमी थे, उन्होंने अपने इकलौते बेटे को अयोध्या जाने से बहुत रोका। उस के ताऊ भी बहुत बिगडे। मगर वह नहीं रूका। हम लोग 6 दिसम्बर से पहले की रात में बाबरी मस्जिद के बिलकुल करीब पहुँच गये और हमने बाबरी मस्जिद के सामने कुछ मुसलमानों के घरों की छतों पर रात गुजशरी। मुझे बार-बार ख्याल होता था कि कहीं 30 अक्तूबर की तरह आज भी हम इस शुभ काम से महरूम (वंचित) न रह जाएँ। कई बार ख्याल आया कि लीडर न जाने क्या करें। हमें खुद ही कारसेवा शुरू करनी चाहिए। मगर हमारे संचलालक ने हमें रोका और डिसिप्लिन(अनुशासन) बनाये रखने को कहा। उमा भारती ने भाषण दिया और कारसेवकों में आग भर दी। मैं भाषण सुनते-सुनते मकान की छत से उतरकर कुदाल लेकर बाबरी मस्जिद की छत पर चढ़ गया। योगेंद्र भी मेरे साथ था।
जैसे ही उमा भारती ने नारा लगाया ‘‘एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड दो’’। बस मेरी मुरादों (इच्छाओं) के पूरा होने का वक्त आ गया और मैंने बीच वाले गुंबद पर कुदाल चलाई और भगवान राम की जय के ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाये। देखते ही देखते मस्जिद मस्मार हो गयी। मस्जिद के गिरने से पहले हम लोग नीचे उतर आये। हम लोग बडे खुश थे। रामलला के लगाये जाने के बाद उसके सामने माथा टेककर हम लोग खुशी से घर आये और बाबरी मस्जिद की दो ईंटें अपने साथ लाये। जो मैं ने खुशी-खुशी पानीपत के साथियों को दिखायीं। वह लोग मेरी पीठ ठोंकते थे। शिवसेना के दफ्तर में वे ईंटे रख दी गयीं और एक जलसा किया गया और सब लोगों ने भाषण में फखर (गर्व) से मेरा जिक्र(उल्लेख) किया कि हमें गर्व है कि पानीपत के नौजवान शिवसैनिक ने सब से पहले राम भक्ती में कुदाल चलायी। मैंने घर भी खुशी से जाकर बताया। मेरे पिताजी बहुत नाराज़ हुए और उन्होंने गहरे दुख का इजहार किया और मुझ से साफ कह दिया कि, अब इस घर में तू और मैं दोनों नहीं रह सकते, अगर तू रहेगा तो मै घर छोडकर चला जाऊँगा, नहीं तो तू हमारे घर से चला जा। मालिक के घर को ढाने वाले की मैं सूरत भी देखना नहीं चाहता। मेरी मौत तक तू मुझे कभी सूरत न दिखाना। मुझे इस का अन्दाज़ा नहीं था। मैं ने उनको समझाने की कोशिश की और पानीपत में जो सम्मान मुझे इस कारनामें पर मिला था वह बताने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि यह देश ऐसे ज़ालिमों की वजह से बर्बाद हो जायेगा और गुस्से में घर से जाने लगे। मैं ने मौके को भाँपा और कहा ‘‘आप घर से न जाएँ, मैं खुद इस घर में नहीं रहना चाहता, जहाँ राम मन्दिर भक्त को ज़ालिम समझा जाता हो’’ और मैं घर छोडकर आ गया और पानीपत में रहने लगा’’

अहमदः अपने कुबूले इस्लाम के बारे में बताइये।
आमिरः प्यारे भाई अहमद! मेरे अल्लाह कैसे करीम (कृपालू) हैं कि जुल्म और शिर्क (अनेकश्वरवाद) के अन्धेरे से मुझे न चाहते हुए इस्लाम के नूर और हिदायत से माला-माल किया। मुझ जैसे ज़ालिम को जिसने उसका मुकद्दस (पवित्र) घर शहीद किया। हिदायत से नवाज़ा। हुआ यह कि मेरे दोस्त योगेंद्र ने बाबरी मस्जिद की दो ईंटें लाकर रखीं और माईक से एलान किया कि राम मन्दिर पर बने ज़ालिमाना ढाँचे की ईंटें सौभाग्य से हमारे तकदीर में आ गयी हैं। सब हिन्दू भाई आकर उन पर (मुत्रादान) पेशाब करें। फिर किया था, भीड लग गयी। हर कोई आता था और उन ईंटों पर हिकारत (तुच्छता) से पेशाब करता था।
मस्जिद के मालिक को अपनी शान भी दिखानी थी। चार पाँच रोज़ के बाद योगेंद्र का दिमाग खराब हो गया। पागल होकर वह नंगा रहने लगा। सारे कपडे उतारता था। वह इज्जत वाले ज़मींदार चैधरी का इकलौता बेटा था। उस पागलपन में वह बार-बार अपनी माँ के कपडे उतारकर उस से मुँह काला करने को कहता। बार-बार इस गंदे जज्बे से उस को लिपट जाता। उस के वालिद बहुत परेशान हुए। बहुत से सियानों और मौलाना लोगों को दिखाया। बार-बार मालिक से माफी मांगते। दान करते, मगर उस की हालत और बिगडती थी। एक रोज़ वह बाहर गए, तो उसने अपनी माँ के साथ गंदी हरकत करनी चाही। उस ने शौर मचा दिया। मौहल्ले वाले आये तो जान बची। उस को जन्जीरों में बाँध दिया गया। योगेंद्र के वालिद इज्जत वाले आदमी थे, उन्होंने उसको गोली मारने का इरादा कर लिया। किसी ने बताया कि यहाँ सोनीपत में ईदगाह में एक मदरसा है। वहाँ बडे मौलाना साहब आते हैं। आप एक दफा उन से और मिल लें। अगर वहाँ कोई हल न हो तो फिर जो चाहे करना। सोनीपत गये तो मालूम हुआ कि मौलाना साहब तो यहाँ पहली तारीख को आते हैं। और परसों पहली जनवरी को आकर दो तारीख की सुबह में जा चुके हैं। चौधरी साहब बहुत मायूस हुए और किसी झाडफूंक करने वाले को मालूम किया। मालूम हुआ कि मदरसे के जिम्मेदार कारी साहब ये काम कर देते हैं, मगर वह भी मौलाना साहब के साथ सफर पर निकल गये हैं। ईदगाह के एक दुकानदार ने उन्हें मौलाना का दिल्ली का पता दिया और यह भी बताया कि परसों बुध को हजरत मौलाना ने (बवाना, दिल्ली) में उनके यहाँ आने का वादा किया है। वह लडके को जन्जीर में बाँधकर बवाना के इमाम साहब के पास ले गए वह आप के वालिद साहब के मुरीद(धर्म-शिष्य) थे और बहुत ज़माने से उन से बवाना के लिये तारीख लेना चाहते थे, मौलाना साहब हर बार उन से माजरत (खेद) कर रहे थे। इस बार उन्होंने इधर के सफर में दो रोज़ के बाद जोहर (दोपहर) की नमाज़ पढने का वादा कर लिया था।
बवाना के इमाम साहब ने बताया कि हालात के खराब होने की वजह से 6 दिसम्बर से पहले हरियाणा के बहुत से इमाम और मुदर्रीसीन (शिक्षक) यहाँ से यु. पी. अपने घरों को चले गए थे और बाज(बहुत से) उन में से एक महीने तक नहीं आये इस लिए मौलाना साहब ने पहली तारीख को इस मौजु (विषय) पर तकरीर की और बडी जोर देकर यह बात कही कि अगर मुसलमानों ने इन गैरमुस्लिम भाईयों को दावत दी होती और इस्लाम और अल्लाह और मस्जिद का परिचय कराया होता तो ऐसे वाकिआत पेश न आते। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद की शहादत के बयक वास्ता हम मुसलमान जिम्‍मेदार हैं और अगर अब भी हमें होश आ जाये और हम दावत का हक अदा करने लगें तो मस्जिद गिराने वाले मस्जिद बनाने और उन को आबाद करने वाले बन सकते हैं। ऐसे मौके पर हमारे आका ‘‘अल्लाहुम्मा अहद कोमी फअन्नाहुम ला यालमून’’ (ऐ अल्लाह मेरी कौम को हिदायत दे, इस लिए कि ये लोग जानते नहीं) फरमाया करते थे। योगेंद्र के वालिद चैधरी रघुबीर सिंह जब बवाना के इमाम (जिन का नाम शायद बशीर अहमद था) के पास पहुंचे तो उन पर उस वक्त अपने शेख (गुरू) की तकरीर का बडा असर था। उन्होंने चौधरी साहब से कहा कि मैं झाड फूँक का काम करता था। मगर अब हमारे हजरत ने हमें इस काम से रोक दिया। क्योंकि इस पेशे में झूठ और औरतों से इख्तेलात (मेल मिलाप) बहुत होता है और इस लडके पर कोई असर या जादू वगैरा नहीं बल्कि मालिक का अजाब (प्रकोप) है। आप के लिए एक मौका है। हमारे बडे हजरत साहब परसों बुध के रोज़ दोपहर को यहाँ आ रहे हैं। आप उनके सामने बात रखें आप का बेटा हमें उम्मीद है कि ठीक हो जायेगा मगर आप को एक काम करना पडेगा। वह यह कि अगर आप का बेटा ठीक हो जाए तो ईमानवाला बनना पडेगा। चौधरी साहब ने कहा ‘‘मेरा बेटा ठीक हो जाये तो मैं सब काम करने को तैयार हूँ’’।
    तीसरे रोज बुध था। चौधरी रघुबीर साहब योगेन्द्र को लेकर सुबह 8 बजे बवाना पहुँच गये। दोपहर को जोहर से पहले मौलाना साहब आये। योगेन्द्र जन्जीर में बंधा नंग-धडंग खडा था। चौधरी साहब रोते हुए मौलाना साहब के कदमों में गिर गए और बोले कि, मौलाना साहब मैंने इस कमीने को बहुत रोका मगर पानीपत के एक ओत के चक्कर में आ गया। मौलाना साहब मुझे क्षमा करा दीजिये मेरे घर को बचा लिजिए। मौलाना साहब ने सख्ती से उन्हें सर उठाने के लिए कहा और पूरा वाकिआ(घटना) सुना। उन्होंने चौधरी साहब से कहा, सारे सन्सार के चलाने वाले सर्व-शक्तिमान (कादिरे मुतलक) खुदा का घर ढाकर इन्होंने ऐसा बडा पाप किया है कि अगर वह मालिक सारे सन्सार को खत्म कर दे तो ठीक हैं, यह तो बहुत कम है कि इस अकेले पर पडी है। हम भी उस मालिक के बंदे हैं और एक तरह से इस बडे घन्घोर पाप में हम भी कुसूरवार हैं। कि हमने मस्जिद को शहीद करने वालों को समझाने का हक अदा नहीं किया। अब हमारे बस में कुछ भी नहीं है। बस यह है कि आप भी और हम भी उस मालिक के सामने गिडगिडाएँ और क्षमा माँगें और हम भी माफी माँगे। मौलाना साहब ने कहा, जब तक हम मस्जिद में प्रोग्राम से फारिग (निवृत्त) हों आप अपने ध्यान को मालिक की तरफ लगाकर सच्चे दिल से माफी और प्रार्थना करें कि मालिक मेरी मुश्किल को आपके अलावा कोई नहीं हटा सकता।

चौधरी साहब फिर मौलाना साहब के कदमों में गिर गये और बोले, जी मैं इस लायक होता तो यह हद क्यों देखता? आप मालिक के करीब हैं। आप ही कुछ करें। मौलाना साहब ने उनसे कहा, आप मेरे पास इलाज के लिए आये हैं। अब जो इलाज में बता रहा हूँ। वह आपको करना चाहिये। वह राजी हो गये। मौलाना साहब मस्जिद में गये नमाज़ पढ़ी, थोडी देर तकरीर (भाषण) की और दुआ की। मौलाना साहब ने सभी लोगों से चौधरी साहब के लिए दुआ को कहा, प्रोग्राम के बाद मस्जिद में नाश्ता हुआ, नाश्ते से फारिग होकर मसिजद से बाहर निकले तो मालिक का करम कि योगेंद्र ने अपने बाप की पगडी उतारकर अपने नंगे जिस्म पर लपेट ली थी और ठीक-ठाक अपने वालिद से बात कर रहा था। सब लोग बहुत खुश हुए। बवाना के इमाम साहब तो बहुत खुश हुए। उन्होंने चौधरी साहब को वादा याद दिलाया और इस से डराया भी कि जिस मालिक ने इस को अच्छा किया है अगर तुम वादे के मुताबिक ईमान नहीं लाएँ तो फिर ये दोबारा इस से ज्यादा पागल हो सकता है। वह तैयार हो गये और इमाम साहब से बोले, मौलाना साहब मेरी सात पुश्ते आप के अहसान (उपकार) का बदला नहीं दे सकतीं आपका गुलाम हूँ, जहाँ चाहें पाप मुझे बेच सकते हैं, हजरत मौलाना को जब यह मालूम हुआ कि इमाम साहब ने उनसे ठीक होने का ऐसा वादा कर लिया था। तो उन्हों ने इमाम साहब को समझाया कि इस तरह करना एहतियात के खिलाफ है। चौधरी साहब को मस्जिद में ले जाने लगे तो योगेन्द्र ने पूछा ‘‘पिताजी कहाँ जा रहे हो? तो उन्होंने कहा, मुसलमान बनने’’। तो योगेन्द्र ने कहा ‘‘मुझे आप से पहले मुसलमान बनना है और मुझे तो बाबरी मस्जिद दोबारा जरूर बनवानी है। खुशी-खुशी उन दोनों को वुजु कराया और कलमा पढवाया गया। वालिद साहब का मुहम्मद उस्मान और बेटे का मुहम्मद उमर नाम रखा गया। खुशी-खुशी वे दोनों अपने गाँव पहुँचे।

वहाँ पर एक छोटी सी मस्जिद है उस के इमाम साहब से जाकर मिले। इमाम साहब ने मुसलमानों को बता दिया। बात पूरे इलाके में फैल गयी। गैरों तक बात पहुँची तो कुव्वतदार(ताकतवर) लोगों की मीटिंग हुयी और तय किया कि उन दोनों को रात में कत्ल करवा दिया जाये। वरना न जाने कितने लोगों का धर्म खराब करेंगे। इस मीटिंग में एक मुर्तद(धर्म-भ्रष्ट) भी शरीक था उसने इमाम साहब को बता दिया। अल्लाह ने खेर की उन दोनों को रातों रात गाँव से निकाला गया। फुलत गये और बाद में जमाअत में 40 दिन के लिए चले गये। योगेन्द्र ने फिर अमीर साहब के मशवरे (सलाह) से तीन चिल्ले (120 दिन) लगाये। बाद में उनकी वालिदा (माँ) भी मुसलमान हो गयीं। मुहम्मद उमर की शादी दिल्ली में एक अच्छे मुसलमान घराने में हो गयी। और वे सब लोग खुशी खुशी दिल्ली में रह रहे हैं, गाँव का मकान और जमीन वगैरा बेचकर दिल्ली में एक कारखाना लिया है।

अहमदः मास्टर साहब, आप से मैं ने आप के इस्लाम कुबूल करने के बारे में सवाल किया था। आप ने योगेंद्र और उन के खानदान की दास्तान सुनायी। वाकई यह खुद अजीबो गरीब कहानी है, मगर मुझे तो आप के कुबूले इस्लाम के बारे में मालूम करना है।

आमिरः प्यारे भाई। असल में मेरे कुबूले इस्लाम को उस कहानी से अलग करना मुमकिन नहीं इस लिए मैंने उस का पहला हिस्सा सुनाया। अब आगे दूसरा हिस्सा सुन लिजिए। मार्च 93 को अचानक मेरे वालिद का हार्ट फेल होकर इंतेकाल (देहांत) हो गया। उन पर बाबरी मस्जिद की शहादत और उस में मेरी शिरकत का बडा गम था। वह मेरी ममी से कहते थे कि मालिक ने हमें मुसलमानों में पैदा क्यों नहीं किया? अगर मुसलमान घराने में पैदा होते, कम अज़ कम जुल्म सहने वालों में हमारा नाम आता। हद से तजावुज(बढने) करने वाली कौम में हमें क्यों पैदा कर दिया? उन्होंने घरवालों को वसीयत की थी कि मेरी अर्थी पर बलबीर न आने पाये, मेरी अर्थी को मिट्टी में दबाना या पानी में बहा देना। हद से तजवावुज़ (बढने) करने वाली कौम के रिवाज के मुताबिक आग मत लगाना। बल्कि शमशान में भी न ले जाना। घरवालों ने उन की इच्छा के मुताबिक अमल गिया और आठ दिन बाद मुझे उनके इन्तेकाल की खबर हुई। मेरा दिल बहुत टूटा। उनके इन्तेकाल के बाद बाबरी मस्जिद का गिराना मुझे जुल्म लगने लगा और मुझे इस पर फख्र (गर्व) के बजाये अफसोस होने लगा और मेरा दिल बुझ सा गया।
मैं घर को जाता तो मेरी मम्मी मेरे वालिद के गम को याद करके रोने लगती और कहती, कि ऐसे देवता बाप को तूने सताकर मार दिया, तू कैसा नीच इन्सान है। मैं ने घर जाना बंद कर दिया। जून में मुहम्मद उमर जमाअत से वापस आया तो पानीपत मेरे पास आया और अपनी पूरी कहानी बतायी। दो महीने से मेरा दिल हर वक्त खौफजदा सा रहता था कि कोई आसमानी आफत मुझ पर न आ जाये। वालिद का दुख और बाबरी मस्जिद की शहादत आफत मुझ पर न आ जाए। वालिद का दुख और बाबरी मस्जिद की शहादत दोनों की वजह से हर वक्त दिल सहमा-सहमा(डरा-डरा) सा रहता था। मुहम्मद उमर ने मुझ पर जोर दिया कि 23 जून को सोनीपत में मौलाना साहब आने वाले हैं। आप उन से जरूर मिलें और अच्छा है कुछ दिन साथ रहें। मैं ने प्रोग्राम बनाया। मुझे पहुँचने में देर हो गयी उमर भाई पहले पहुँच गये थे और मौलाना साहब से मेरे बारे में पूरा हाल बता दिया था। मैं गया तो मौलाना साहब बडी मुहब्बत से मिले और मुझ से कहा, आप की इस तहरीक (प्रेरणा) पर उस गुनाह को करने वाले योगेन्द्र के साथ मालिक यह मामला कर सकते हैं। आप के साथ भी यही मामला पेश आ सकता है और अगर इस दुनिया में वह मालिक सजा न भी दें तो मरने के बाद हमेशा के जीवन में जो सजा मिलेगी आप उस का तसव्वुर (कल्पना) भी नहीं कर सकते। एक घंटा साथ रहने के बाद मैं ने फैसला कर लिया कि अगर मुझे आसमानी आफत से बचना है तो मुसलमान हो जाना चाहिए।
  मौलाना साहब दो रोज़ के सफर पर जा रहे थे। मैं ने दो रोज़ साथ रहने की ख्वाहिश का इजहार किया तो उन्होंने खुशी से कुबूल किया। एक रोज़ हरियाणा फिर दिल्ली और खुर्जा का सफर था। दो रोज़ के बाद फुलत पहुंचे। दो रोज़ के बाद मैं दिल से इस्लाम के लिए आमादा (तैयार) हो चुका था। मैंने उमर भाई से अपना ख्याल जाहिर किया तो उन्होंने खुशी खुशी मौलाना साहब से बताया और अलहम्दुलिल्लाह मैं ने 25 जून 93 जोहर (दोपहर) के बाद इस्लाम कुबूल किया। मौलाना साहब ने मेरा नाम मुहम्मद आमिर रखा। इस्लाम के मुताला (वाचन) ओर नमाज़ वगैरा याद करने के लिए मुझे फुलत रहने का मशवरा दिया। मैंने अपनी बीवी और बच्चों की मजबूरी का जिक्र किया तो मेरे लिए मकान का नज्म (व्यवस्था) कर दिया गया। मैं चंद माह फुलत आकर रहा। और अपनी बीवी पर काम करता रहा तीन महीने के बाद वह भी मुसलमान हो गयी, अलहम्दुलिल्लाह।

अहमदः आपकी वालिदा का क्या हुआ?
आमिरः मैं ने अपनी माँ से अपने मुसलमान होने के बारे में बताया, वह बहुत खुश हुईं और बोली कि मेरे पिताजी को इससे शांति मिलेगी। वह भी इसी साल मुसलमान हो गयीं।

अहमदः आजकल आप क्या कर रहे हैं?
आमिरः आजकल मैं जूनियर हाई-स्कूल चला रहा हूँ। जिसमें इस्लामी तालीम के साथ अंग्रेजी मीडियम में तालीम का नज्म है।

अहमदः अबी बता रहे थे कि हरियाणा पंजाब वगैरा की गैरआबाद मस्जिदों को आबाद करने की बडी कोशिश आप कर रहे हैं।
आमिरः मैंने उमर भाई से मिलकर यह प्रोग्राम बनाया कि अल्लाह के घर को शहीद करने के बाद इस बडे गुनाह की तलाफी(क्षति-पूर्ति) के लिये हम वीरान मस्जिदों को आबाद करने और कुछ नई मस्जिदें बनाने का बेडा उठाएँ। हम दोनों ने यह तय किया कि काम तकसीम(बाँट) कर लें, मैं वीरान मस्जिदों को आबाद करवाऊँ और उमर भाई नयी मस्जिदें बनाने की कोशिश करें और एक दूसरे का तआवुन(मदद) करें। हम दोनों ने जिन्दगी में सौ-सौ मस्जिदें बनाने और वागुजार (मुक्त) कराने का प्रोग्राम बनाया है। अलहम्दु लिल्लाह 6 दिसम्बर 2004 तक 13 वीरान और मकबूजा मस्जिदें हरियाणा, पंजाब और दिल्ली और मेरठ केंट में वागुजार कराके यह पापी आबाद करा चुका है। (जुलाई 2009 तक 67 मस्जिदें वागुजार और 37 नई बन चुकी हैं)। उमर भाई मुझ से आगे निकल गए वह अब तक बीस मस्जिदें नयी बनवा चुके हैं ओर इक्कीसवीं की बुनियाद रखी है। हम लोगों ने यह तय किया है कि बाबरी मस्जिद की शहादत की हर बरसी पर 6 दिसंबर को एक वीरान मस्जिद में नमाज़ शुरू करानी है और उमर भाई को नई मस्जिद की बुनियाद जरूर रखनी है। अलहम्दु लिल्लाह कोई साल नागा नहीं हुआ। अलबत्ता सौ का निशाना अभी बहुत दूर है। इस साल उम्मीद है तादाद बहुत बढ जायेगी। आठ मस्जिदों की बात चल रही है। उम्मीद है वे आईन्दा चंद माह में जरूर आबाद हो जायेंगी। उमर भाई तो मुझ से बहुत आगे पहले ही हैं। और असल में काम भी उनही के हिस्से में है। मुझे अन्धेरे से निकालने का जरिया वही बने।

अहमदः आप के खानदान वालों का क्या ख्याल है?
आमिरः मेरी वालिदा के अलावा एक बडे भाई हैं। हमारी भाभी का चार साल पहले इन्तेकाल हो गया। उनकी शादी मुझ से बाद में हुई थी। उनके चार छोटे-छोटे बच्चे हैं। एक बच्चा माजूर (अपंग) सा है हमारी भाभी बडी भली औरत थी। भाई साहब के साथ बडी मिसाली बीवी बनकर रही उनके इन्तेकाल के बाद भाई साहब बिल्कुल टूट से गये थे। मेरे बडे भाई खुद एक बहुत शरीफ आदमी हैं। वह मेरी बीवी की इस खिदमत से बहुत मुतअस्सिर (प्रभावित) हुए। मैं ने उनको इस्लाम की दावत दी मगर मेरी वजह से मेरे वालिद के सदमे (झटके) की वजह से वह मुझे कोई अच्छा आदमी नहीं समझते थे। मैंने अपनी बीवी से मशवरा किया। मेरे बच्चे बडे हैं और भाई मुश्किल से जूझ रहे हैं। अगर मैं तुम्हें तलाक दे दूँ और इद्दत के बाद भाई तैयार हो जाएँ कि वह मुसलमान होकर तुमसे शादी करलें तो दोनों के लिए निजात का जरिया बन सकता है। वह पहले तो बहुत बुरा मानी। मगर जब मैंने उस को दिल से समझाने की कोशिश की तो वह राजी हो गई। मैंने भाई को समझाया, इन बच्चों की जिन्दगी के लिए अगर आप मुसलमान हो जाएँ और मेरी बीवी से शादी करलें तो इस में क्या हर्ज है और कोई ऐसी औरत मिलना मुश्किल है जो माँ की तरह इन बच्चों की परवरिश कर सके। वह भी शुरू में बुरा मानें कि लोग क्या कहेंगे? मैंने कहा, अक्ल से जो बात सही है उसको मानने में क्या हर्ज है? बाहम(परस्पर, आपसी) मशवरा हो गया। मैं ने अपनी बीवी को तलाक दी और इद्दत गुज़ारकर भाई को कलमा पढ़वाया और उनसे उस का निकाह कराया। अल्हमदु लिल्लाह वे बहुत खुशी-खुशी जिन्दगी गुजार रहे हैं। मेरे और उनके बच्चे उनके साथ रहते हैं। आजकल मैं जूनियर हाई-स्कूल चला रहा हूँ। जिसमें इस्लामी तालीम के साथ अंग्रेजी मीडियम में तालीम का नज्म है।



अहमदः आप अकेले रहते हैं?
आमिरः हजरत मौलाना के मशवरे से मैं ने एक नव-मुस्लिम औरत से जो काफी मुअम्मर (वयोवृद्ध) हैं शादी कर ली है। अलहम्दुलिल्लाह खुशी-खुशी हम दोनों भी रह रहे हैं।

अहमदः कारिईने अरमुगान के लिए कुछ पैगाम आप देना चाहेंगे?
आमिरः मेरी हर मुसलमान से दरख्वास्त है कि अपने मकसदे जिन्दगी को पहचाने और इस्लाम को इन्सानियत की अमानत समझकर उस को पहुंचाने की फिक्र करे। महज़ इस्लाम दुश्‍मनी की वजह से उनसे बदले का जज्बा ना रखे। अहमद भाई मैं यह बात बिलकुल अपने जाती (व्यक्तिगत, निजि) तजर्बे से कह रहा हूँ कि बाबरी मस्जिद की शहादत में शरीक हर एक शिव सैनिक, बजरंग दली और हिन्दू को अगर यह मालूम होता कि इस्लाम क्या है? मुसलमान किसे कहते हैं? कुरआन क्या है? और मस्जिद क्या चीज़ है? तो उन में से हर एक मस्जिद बनाने की तो सोच सकता है, मस्जिद गिराने की तो सोच ही नहीं सकता।
   मैं यकीन से कह सकता हूँ कि बाल ठाकरे जी, विनय कटियार, उमा भारती और अशोक सिंघल जैसे सरकर्दा (प्रमुख) लोगों को भी इस्लाम की हकीकत मालूम हो जाए और यह मालूम हो जाए कि इस्लाम हमारा भी मजहब है हमारे लिए भी जरूरी है तो उन में से हर एक अपने खर्च से दोबारा बाबरी मस्जिद तामीर करने को सआदत (सौभाग्य) समझेगा।

अहमद भाई कुछ ही लोग ऐसे हैं जो मुसलमानों की दुशमनी के लिए मशहूर हैं। एक अरब हिन्दुओं में ऐसे लोग एक लाख भी नहीं होंगे। एक लाख भी सच्ची बात यह है हैं कि मैं शायद ज्यादा बता रहा हूँ। 99 करोड 99 लाख तो मेरे वालिद की तरह हैं। जो इन्सानियत दोस्त बल्कि इस्लामी उसूलों (तत्वों) को दिल से पसंद करते हैं। अहमद भाई। मेरे वालिद (रोते हुए) क्या फितरतन (स्वभावतः) मुसलमान नहीं थे? मगर ईमान वालों के दावत न देने की वजह से वह इन्कार पर मर गए।
 मेरे साथ और मेरे वालिद के साथ मुसलमानों का कितना बडा जुल्म है। यह बात सच्ची है कि बाबरी मस्जिद को शहीद करने वाले मुझसे ज्यादा जालिम तो वे मुसलमान हैं जिन की दअवत से गफलत की वजह से मेरे ऐसे प्यारे बाप दोजख में चले गए। मौलाना साहब सच कहते हैं, हम शहीद करने वाले भी न जानने और मुसलमानों के ना पहचानने की वजह से हुए। हम ने अन्जाने में ऐसा जुल्म किया और मुसलमान जान बूझकर उनके दोजख़ में जाने का जरिया बन रहे हैं। मुझे जब अपने वालिद के कुफ्र पर मरने का रात में भी ख्याल आता है तो मेरी नींद उड जाती है। हफ्ता-हफ्ता नींद नहीं आती। नींद की गोलियां खानी पडती हैं। काश मुसलमानों को इस दर्द का एहसास हो।

अहमदः बहुत बहुत शुक्रिया। माशा अल्लाह आपकी जिन्दगी अल्लाह की सिफते हादी (सण्मार्ग-दर्शक गुण) और इस्लाम की हक्कानियत (सच्चाई) की खुली निशानी है।

 आमिरः बिलाशुबा(बे-शक) अहमद भाई। इस लिए मेरी ख्वाहिश थी कि अरमुगान में यह छपे, अल्लाह तआला इस की इशाअत (प्रकाशन) को मुसलमानों के लिए आँख खोलने का जरिया बनाये। आमीन, अच्छा, अल्लाह हाफिज।
                                                                          (साभारः उर्दू मासिक ‘अरमुगान‘ फुलत, जून 2005)


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एक अमेरिकी पादरी जिसने इस्लाम कबूल किया

Posted by इस्लामिक वेबदुनिया on 12:47
       जेसॉन क्रुज,पूर्व ईसाई पादरी

अल्लाह का शुक्र है कि मुझे अल्लाह ने 2006 में इस्लाम रूपी बेशकीमती ईनाम से नवाजा। जब भी कोई मुझसे यह पूछता है कि मैं कैसे इस सच्चे धर्म की तरफ आया तो मैं झिझक जाता हूं। क्योंकि यह मेरी काबलियत नहीं बल्कि यह अल्लाह ही की हिदायत और रहमत है कि उसने मुझे सच्ची राह दिखाई। बिना अल्लाह की मर्जी और रहमत के कोई इस सच्चे मार्ग की तरफ नहीं आ सकता।

मैं न्यूयॉर्क के एक कैथोलिक परिवार में पैदा हुआ। मेरे माता और पिता रोमन कैथोलिक थे। हम इतवार को चर्च जाते थे। पहले मैंने ईसाई धर्म की शिक्षा ली,ईसा मसीह के स्मरणार्थ पहले भोज में शामिल हुआ और फिर मैंने रोमन कैथोलिक चर्च की सदस्यता कबूल कर ली। जब मैं जवान हुआ तो मुझे परमेश्वर की ओर से मार्गदर्शन के संकेत का अहसास होने लगा। इसका अर्थ मैंने यह लगाया कि यह मेरे लिए रोमन कैथोलिक पादरी बनने का मैसेज है। मैंने यह बात अपनी मां को बताई तो वह बहुत खुश हुई और वह मुझे हमारे इलाके के पादरी के पास ले गई।

इसे दुर्भाग्य मानें या सोभाग्य कि यह ईसाई पादरी अपने पेशे से खुश नहीं था और इसने मुझे पादरी बनने के विचार से ही दूर रहने की सलाह दी। इससे मैं विचलित हुआ। इस बीच परमेश्वर के शुरूआती मैसेज के अहसास को भूला देने,अपनी मूर्खता और किशोर अवस्था के चलते मैंने एक अलग ही रास्ता चुन लिया। बदकिस्मती से जब मैं सात साल का था तो मेरा परिवार बिखर गया। मेरे माता-पिता के बीच तलाक हो गया और मैं अपने पिता से दूर हो गया।

पन्द्रहवें साल में पहुंचने पर मैं पार्टियों और नाइट क्लबों में जाने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगा। पहले मैंने वकील बनने का ख्वाब संजोया और फिर राजनेता बनने के सपने देखने लगा ताकि अच्छी लाइफ स्टाइल जी सकूं । हाई स्कूल पास करने के बाद मैं कॉलेज पहुंचा लेकिन मैं वहां पढ़ नहीं पाया और वहां से ऐरीजोना(जहां मैं अब तक लगातार रहा) आया और यहां डिग्री पूरी होने तक रहा। एरीजोना में एक दिन मेरी तबियत ज्यादा खराब हो गई। दरअसल मैं वहां घर से भी ज्यादा बुरे लोगों की संगत में फंस गया था। शिक्षा कम होने की वजह से मुझे छोटे-मोटे काम करने पड़े। मैं नशे,बदचलनी और नाइट क्लब में जाने की आदत का शिकार हो गया। इसी दौरान मैं पहली बार एक मुस्लिम शख्स से मिला। वह एक नेक इंसान था और विदेशी छात्र के रूप में शिक्षा हासिल कर रहा था। वह मेरे दोस्तों के साथ पार्टी वगैरह में आता था। मैंने उससे इस्लाम पर तो चर्चा नहीं की लेकिन उससे उसके कल्चर को लेकर सवाल किए जिसका जवाब उसने खुलकर दिया। मेरी जिंदगी का यह बुरा दौर कुछ सालों तक चला। मैं इस जिंदगी के बारे में ज्यादा नहीं बताना चाहता। मुझे बहुत से आघात लगे। मेरे जानकार लोग मारे गए। मुझे चाकुओं से गोदा गया और भी कई जख्म मुझे मिले। यह कोई ड्रग्स के खतरों की कहानी नहीं है। मैं अपनी इस बुरी जिंदगी का आपके सामने जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि मैं आपको यह बात जोर देकर बताना चाहता हूं कि अगर ईश्वर चाहे तो बुरे हालात में भी आपको राह दिखाकर नारकीय जिंदगी से बाहर निकाल सकता है। आपको सही राह पर ला सकता है।

मैंने सुपर पावर के साथ फिर से जुड़ाव महसूस किया और इसी दौरान नशीली चीजों का सेवन करना छोड़ दिया। ईश्वरीय कृपा के चलते ही मैं इन बुराइयों से बच पाया। दरअसल मैं परमेश्वर से जुड़ाव खो चुका था जो कभी पहले मेरा उससे रहा था। मैं फिर से सच्चे ईश्वर की तलाश में जुट गया। बदकिस्मती से मैं पहली बार में सच्चाई को नहीं पा सका और मैंने हिन्दू धर्म अपना लिया। हिन्दू धर्म में मुझे इस बात ने प्रभावित किया था कि आखिर हमें कष्ट क्यों झेलने पड़ते हैं। मैंने पूरी तरह हिन्दू धर्म अपना लिया,यहां तक मैंने अपना नाम भी बदलकर हिन्दू नाम रख लिया। इस बदलाव से मैं नशीली चीजों के सेवन से दूर रहा और मेरी जिंदगी सकारात्मक दिशा की तरफ चलने लगी। लेकिन मैं फिर से ईश्वर की तरफ से एक चुभन महसूस करने लगा। मुझे यहां भी सुकून नहीं मिला। सच की तलाश को लेकर मेरे में बेचैनी अभी भी बनी थी। इसी के चलते मैंने हिन्दू धर्म छोड़ दिया और मैं फिर से ईसाई धर्म में आ गया। मुझे महसूस हुआ कि परमेश्वर मेरी सेवाएं एक पादरी के रूप में चाहता है। इसलिए मैंने पादरी के रूप में सेवाएं देने के लिए रोमन कैथोलिक चर्च में सम्पर्क किया। मुझे न्यू मेक्सिको में मोनेस्टरी में एक पोस्ट के साथ शिक्षा देने का प्रस्ताव रखा गया। उस वक्त मेरी मां,भाई और बहिन भी एरीजोना आ गए थे और यहां मेरी कई लोगों से अच्छी दोस्ती थी। मैं न्यू मैक्सिको जा नहीं पाया और एरीजोना के ही एक कैथोलिक चर्च से जुड़कर विभिन्न सेमीनार के जरिए मैंने घर रहते हुए ही ईसाइयत का अध्ययन किया। बाद में मैं एरीजोना में ही स्वतंत्र रोमन कैथोलिक चर्च में नियुक्त कर दिया गया। मैंने चर्च से जुड़ी कई सेमीनार अटेंड की और फिर 2005 में मुझे पादरी के रूप में नियुक्त कर दिया गया। मुझे विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच जाकर ईसाइयत का मैसेज देने की जिम्मेदारी दी गई। मेरा काम शहरी क्षेत्र में जाकर विभिन्न धर्मों के लोगों की आस्था,रीति-रिवाजों को समझना और उनको ईसाइयत का मैसेज देना था। मैं अधिकतर ईसाई रीति-रिवाजों का पहले ही अध्ययन कर चुका था और इनसे वाकिफ था। मैंने यहूदी और पूर्वी धर्मों का भी अध्ययन कर लिया था।

जहां में काम करता था वहां नजदीक की गली में ही एक मस्जिद थी। मैंने सोचा कि मेरे लिए अच्छा मौका है कि मैं इस्लाम के बारे में भी सीखूं ताकि विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच संवाद के अपने काम को और मजबूत बना सकूं। मैं टेम्पे मस्जिद गया और वहां मुझे अच्छे लोग मिले। मैंने इस्लाम का अध्ययन करना शुरू कर दिया। जो कुछ मैंने पढ़ा उसने मेरे दिल को बेहद प्रभावित किया। मैं फिर मस्जिद गया और वहां पर मैं एक काबिल टीचर अहमद अल अलकयूम से मिला। ब्रदर अहमद अल अलकयूम अमेरिकन मुस्लिम सोसायटी के रीजनल डायरेक्टर थे। वे मस्जिद में सभी धर्मों के लोगों के लिए एक ऑपन क्लास लेते थे जिसमें वे इस्लाम का परिचय कराते थे। मैं भी उनकी क्लास में शामिल होने लगा। क्लास में शामिल होने के दौरान ही मुझे यकीन होने लगा कि इस्लाम ही सच्चा धर्म है। और कुछ दिनों बाद ही मैंने इस्लाम का कलमा पढ़कर मैं मुसलमान बन गया।

ब्रदर अहमद अल अलकयूम और शेख अहमद शकीरात दोनों बहुत बड़ी हस्ती हैं और इन्हीं की वजह से मेरा इस्लाम में आना आसान हुआ। मैंने चर्च से इस्तीफा दे दिया और अल्लाह का शुक्र है कि मैं तभी से मुसलमान हूं। इस्लाम कबूल करने के साथ ही मेरी जिंदगी में अच्छे बदलाव आए। पादरी का पद छोडऩे और इस्लाम अपनाने पर मेरे परिवारवालों को बेहद आश्चर्य हुआ। वे कुछ समझ नहीं पाए बल्कि वे तो इस्लाम से भयभीत थे। बाद में उन्हें महसूस हुआ कि कुरआन और सुन्नत के प्रति जबरदस्त भरोसे से मेरा जीवन ज्यादा खुशहाल हुआ है और मेरा घर वालों के साथ बेहतर ताल्लुकात हुए हैं तो फिर उन्हें लगा कि इस्लाम तो अच्छा धर्म है। ब्रदर अहमद जानते थे कि इस्लाम अपनाने के बाद का एक साल मुश्किलों भरा होता है,उन्होंने इस दबाव को झेलने के तरीके सुझााए। मैं कई नवमुस्लिम से भी मिला। मैं अब एक मुस्लिम के रूप में बेहतर तरीके से काम को अंजाम देने वाला बन गया। मैं एक प्रोग्राम का मेनेजर बना। इस प्रोग्राम का मकसद प्रभावित लोगों को अल्कोहल,एड्स और हेपेटाइटिस से बचाना था।

मैं मुस्लिम अमेरिकन सोसायटी का ही स्वंयसेवी नहीं बना बल्कि एरीजोना के मुस्लिम यूथ सेन्टर और अन्य मुस्लिम समाजसेवी संस्थाओं से भी जुड़ गया। मुझो हाल ही टेम्पे मस्जिद के बोर्ड में भी शामिल किया गया है जहां मैंने इस्लाम कबूल किया था। अब मैं सच्चे मुस्लिम दोस्त ही रखता हूं। अब मैं मौज-शौक से जुड़ी पार्टियों में हिस्सा नहीं लेता। अगर अल्लाह ने चाहा तो मैं इस्लाम की खिदमत के लिए मेरे पसंदीदा इस्लामी विद्वानों से इस्लाम का ज्यादा से ज्यादा इल्म हासिल करूंगा। आज मैं जो कुछ भी हूं अल्लाह के रहमो करम से हूं और जो कुछ मेरे में कमियां-खामियां रहीं वे मेरी वजह से रही।

इंग्लैण्ड का ईसाई पादरी बन गया मुसलमान

Posted by इस्लामिक वेबदुनिया on 12:05

ब्रिटेन का एक पूर्व कैथोलिक ईसाई पादरी कुरआन से इतना प्रभावित हुआ कि इस्लाम कबूल कर लिया।


ईमानवालों के साथ दुश्मनी करने में यहूदियों और बहुदेववादियों को तुम सब लोगों से बढ़कर सख्त पाओग। और ईमानवालों के साथ दोस्ती के मामले में सब लोगों में उनको नजदीक पाओगे जो कहते हैं कि हम नसारा (ईसाई) हैं। यह इस वजह से है कि उनमें बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं और इस वजह से कि वे घमण्ड नहीं करते।

जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें आंसुओं से छलकने लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है। वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले।

                                                                                                        (सूरा:अल माइदा ८२-८३)

कुरआन की ये वे आयतें है जिन्हें इंग्लैण्ड में अपने स्टूडेण्ट्स को पढ़ाते वक्त इदरीस तौफीक बहुत प्रभावित हुए और उन्हें इस्लाम की तरफ लाने में ये आयतें अहम साबित हुईं।

काहिरा के ब्रिटिश परिषद में दिए अपने एक लेक्चर में तौफीक ने साफ कहा कि उसे अपनी पिछली जिंदगी और वेटिकन में पादरी के रूप में गुजारे पांच साल को लेकर किसी तरह का अफसोस नहीं है। मै एक पादरी के रूप में लोगों की मदद कर खुशी महसूस करता था लेकिन फिर भी दिल में सुकून नहीं था। मुझो अहसास होता था कि मेरे साथ सब कुछ ठीकठाक नहीं है। अल्लाह की मर्जी से मेरे साथ कुछ ऐसे संयोग हुए जिन्होंने मुझो इस्लाम की तरफ बढ़ाया। ब्रिटिश परिषद के खचाखच भरे हॉल में तौफीक ने यह बात कही।
  तौफीक के लिए दूसरा अच्छा संयोग यह हुआ कि उन्होंने वेटिकन को छोड़कर इजिप्ट का सफर करने का मन बनाया।

मैं इजिप्ट को लेकर अकसर सोचता था-एक ऐसा देश जिसकी पहचान पिरामिड,ऊंट,रेगिस्तान और खजूर के पेड़ों के रूप में है। मैं चार्टर उड़ान से हरगाडा पहुंचा। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि यह तो यूरोपियन देशों के दिलचस्प समुद्री तटों की तरह ही खूबसूरत था। मैं पहली बस से ही काहिरा पहुंचा जहां मैंने एक सप्ताह गुजारा। यह सप्ताहभर का समय मेरी जिंदगी का अहम और दिलचस्प समय रहा। यहीं पर पहली बार मेरा इस्लाम और मुसलमानों से परिचय हुआ। मैंने देखा कि इजिप्टियन कितने अच्छे और व्यवहारकुशल होते हैं,साथ ही साहसी भी।
ब्रिटेन के अन्य लोगों की तरह पहले मुसलमानों को लेकर मेरा भी यही नजरिया था कि मुसलमान आत्मघाती हमलावर,आतंकवादी और लड़ाकू होते हैं। दरअसल ब्रिटिश मीडिया मुसलमानों की ऐसी ही इमेज पेश करता है। इस वजह से मेरी सोच बनी हुई थी कि इस्लाम तो उपद्रवी मजहब है। काहिरा में मुझो अहसास हुआ कि इस्लाम तो बहुत ही खूबसूरत धर्म है। इसको जिंदगी में अपनाने वाले मुस्लिम बहुत ही सीधे और सरल होते हैं। मस्जिद से नमाज की अजान सुनते ही वे अपना काम-धंधा छोड़कर अल्लाह की इबादत के लिए दौड़ पड़ते हैं। वे अल्लाह क ी इच्छा और इसकी रहमत पर जबरदस्त भरोसा रखते हैं। वे पंाच वक्त नमाज अदा करते हैं,रोजे रखते हैं,जरूरतमंद लोगों की मदद करते हैं और हज के लिए मक्का जाने की ख्वाहिश रखते हैं। वे यह सब इस उम्मीद में करते हैं कि अल्लाह उन्हें मौत के बाद दूसरी जिंदगी में जन्नत में दाखिल करेगा।


'काहिरा से लौटने के बाद मैं धार्मिक शिक्षा देने के अपने पुराने काम में फिर से जुट गया। ब्रिटेन में धार्मिक विषयों क ा अध्ययन अनिवार्य विषय के रूप में है। मैं ईसाइयत,इस्लाम,यहूदी,बोद्ध और अन्य धर्मों के बारे में स्टूडेण्ट्स को पढ़ाता था। इस वजह से मुझो इन धर्मों के बारे में अध्ययन करना पड़ता था कि मैं इन्हें इन धर्मों के बारे में बता सकूं । मेरी क्लास में कुछ अरब के मुस्लिम छात्र भी थे। यूं समझिाए की इस्लाम के बारे में पढ़ाने के लिए खुद अध्ययन करते वक्त मैंने इस्लाम के बारे में काफी कुछ जाना।'

'अरब के वे मुस्लिम छात्र बहुत ही नम्र,शालीन और व्यवहारकुशल थे। मेरी उनसे दोस्ती हो गई। उन्होंने मुझासे मेरे क्लासरूम में रमजान के महीने के दौरान नमाज पढऩे की इजाजत मांगी। दरअसल मेरे क्लासरूम में कारपेट बिछा होता था। वे नमाज अदा करते और मैं उनको पीछे बैठकर देखता रहता। उनसे प्रेरित होकर मैंने भी रोजे रखे हालांकि अभी मैं मुसलमान नहीं हुआ था।

'एक बार कुरआन का अध्ययन करते वक्त मेरे सामने यह आयत आई-

जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें आंसुओं से छलकने लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है। वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले।

यह आयत पढऩे के बाद मैं यह देखकर हैरान हो गया कि मेरी आंखों से आंसू निकल रहे हैं। मैंने मुश्किल से स्टूडेण्ट्स के सामने अपने आंसू छिपाए।'

और जिंदगी बदल गई

अमेरिका पर ११ सितम्बर २००१ को आतंकी हमला होने के बाद तौफीक की जिंदगी में एक बहुत बड़ा बदलाव आया।
'उन दिनों मैं भी बाहर नहीं निकला और मैंने देखा कि लोग काफी भयभीत थे। मैं भी काफी डरा हुआ था और आशंका थी कि इस तरह के आतंकी हमले ब्रिटेन में भी हो सकते हैं। उस वक्त पश्चिम के लोग इस्लाम से घबराने लगे और उन्होंने आतंकवाद के लिए इस्लाम को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया।'

'हालांकि मेरा तो मुसलमानों के साथ अलग तरह का अनुभव था और मैं इसके लिए इस्लाम को कतई जिम्मेदार नहीं मानता था। मुझो हैरत हुई-इस्लाम इसके लिए जिम्मेदार कैसे हुआ? कुछ सिरफिरे मुस्लिमों द्वारा किए गए इस कुकृत्य के लिए आखिर इस्लाम को दोषी कैसे माना जा सकता है? जब ऐसी ही किसी घटना को कोई ईसाई अंजाम देते हैं तब तो इसके लिए ईसाइयत को जिम्मेदार नहीं माना जाता?

एक दिन मैं इस्लाम के बारे में और भी जानने के लिए लंदन की सबसे बड़ी मस्जिद लन्दन सैन्ट्रल मस्जिद पहुंचा। वहां इस्लाम कबूल कर चुके पूर्व पॉप स्टार यूसुफ इस्लाम एक सर्किल में बैठकर लोगों से इस्लाम के बारे में चर्चा कर रहे थे। वहां पहुंचने के थोड़ी देर बाद मैंने उनसे पूछा- आखिर आपने इस्लाम क्यों कबूल किया?
उन्होंने जवाब दिया-एक मुस्लिम एक ईश्वर में भरोसा करता है। पांच वक्त नमाज अदा करता है। रमजान के रोजे रखता है। मैंने बीच में ही उनको रोकते हुए कहा-मैं भी इन सब में भरोसा रखता हूं और रमजान के दौरान रोजे रखता हूं।,उन्होंने कहा-फिर तुम किस बात का इन्तजार कर रहे हो? कौनसी बात तुम्हें मुसलमान होने से रोके हुए है? मैंने कहा-नहीं, मेरा धर्म-परिवर्तन का कोई इरादा नहीं है।
इसी पल नमाज के लिए अजान हुई और सभी वुजू बनाकर नमाज अदा करने के लिए लाइन में जाकर खड़े हो गए। मैं पीछे की तरफ बैठ गया। मैं मन ही मन चिल्लाया। मन ही मन सोचा आखिर मैं ऐसी बेवकूफी क्यों कर रहा हूं? जब वे नमाज पढ़ चुके तो मैं यूसुफ इस्लाम के पास गया और इस्लाम कबूल करने के लिए कलमा पढ़ाने के लिए उनसे कहा। यूसुफ इस्लाम ने पहले मुझो अंग्रेजी में अरबी कलमे के मायने बताए और फिर मैंने भी कलमा पढ़ लिया- 'अल्लाह के सिवाय कोई इबादत के लायक नहीं और मुहम्मद सल्ल. अल्लाह के पैगम्बर हैं।'

 यह कहते हुए तौफीक की आंखों में आंसू निकल पड़े।
इस तरह तौफीक की जिंदगी ने एक नई दिशा ली। इजिप्ट में रहते हुए तौफीक ने इस्लाम के उसूलों पर एक किताब गार्डन ऑफ डिलाइट लिखी। अपनी इस किताब के बारे में तौफीक ने कहा-हर कोई यह कहता है कि इस्लाम का आतंकवाद से कोई ताल्लुक नहीं है और इस्लाम नफरत पैदा करने वाला मजहब नहीं है लेकिन वे लोगों को नहीं बताते कि इस्लाम कितना खूबसूरत मजहब है और इसमें इंसानियत से जुड़े कितने अच्छे उसूल हैं। इस वजह से मैंने इस्लाम के आधारभूत उसूलों पर किताब लिखना तय किया। मैं लोगों को बताता हूंं कि इस्लाम तो इंसानियत को बढ़ावा देने वाला मजहब है जिसमें सबके साथ बेहतर सलूक करने पर जोर दिया गया है। पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. फरमाते हैं-अपने भाई को देखकर मुस्कराना भी नेकी है।

तौफीक ने बताया कि वे पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. पर एक किताब लिख रहे हैं जो उन पर पहले से लिखी गई किताबों से अलग हटकर होगी। तौफीक का मानना है कि अपनी जिंदगी में इस्लाम के उसूलों को अपनाकर ही दुनिया के सामने इस्लाम को अच्छे अंदाज में रखा जा सकता है। यही अच्छा तरीका है दुनिया के सामने इस्लाम को सही तरीके से पेश करने का।

यह आर्टिकल इजिप्टियन गजट में २ जुलाई २००७ को अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था।

 

 

क्रिकेटर ब्रायन लारा मुसलमान हो गया?

Posted by इस्लामिक वेबदुनिया on 10:29






पिछले कुछ माह से इंटरनेट पर यह मुद्दा जोर पकड़े हुए है। सवालों पर सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या वास्तव में वेस्टइंडीज के महान क्रि केटर ब्रायन लारा मुसलमान हो गए हैं।

खबर यह है कि पाकिस्तानी क्रिकेटर सईद अनवर और पाकिस्तान के पूर्व पॉप स्टार जूनेद जमशेद के हाथों ब्रायन लारा ने इस्लाम कबूल कर लिया है।

हालांकि इस खबर की पूरी तरह पुष्टि नहीं हुई है लेकिन इन दिनों ब्रायन लारा क्रिकेट को लेकर नहीं बल्कि इस्लाम अपनाने को लेकर चर्चा का विषय बने हुए हैं।

यहां कुछ लिंक है उन वेबसाइट्स के जहां ब्रायन लारा के इस्लाम कबूलने संबंधी सवाल जवाब है।
http://answers.yahoo.com/question/index?qid=20090505050652AA4VBFy
http://wiki.answers.com/Q/Did_Brian_Lara_embrace_Islam_How_true_it_is
http://www.ummah.net/forum/showthread.php?t=212836

अमरीकी महिला पत्रकार जो मुसलमान हो गयी

Posted by इस्लामिक वेबदुनिया on 08:18
मेरी कोशिशों से तीन सौ व्यक्तियों ने मादक-द्रव्यों से तौबा की है और इक्कीस मर्दों और औरतों ने इस्लाम ग्रहण किया है। मैं एक अपाहिज औरत हूं। मगर मैं अपने आपको अपाहिज नहीं समझती, क्योंकि मेरा ईमान है कि जो व्यक्ति मुसलमान हो जाए, वह कभी अपाहिज नहीं हो सकता, क्योंकि खुदा उसका सहारा बन जाता है।सुश्री आमिना अश्वेत अमेरिकी महिला हैं, जो अपनी सामाजिक सेवाओं के कारण विश्व प्रसिद्ध हैं। १९८० ई० में इनके कार्यों पर एक पुस्तक प्रकाशित हुई। उसके अनुसार ३५० व्यक्तियों ने उनकी प्रेरणा से नशा-सेवन छोड़ा था और २१ औरत-मर्दों ने इस्लाम कबूल कर लिया था।
उल्लेखनीय बात यह है कि शिकागो न्यूज़ से संबंध रखने वाली विलक्षण प्रतिभा की धनी ये पत्रकार महिला शारीरिक रूप से अपंग हैं। वे शिकागो के हबशियों की झोपड़ पट्टी में पैदा हुई, जहां गन्दगियों, अपराधों, नशाख़ोरियों, निर्धनता और दरिद्रता का गढ़ था। उनका पैदाइशी नाम सिंथिया था और उनके पिता भी हबशियों की तरह आवारागर्द, नशाख़ोर और अपराधी प्रवृति के थे। उनकी मां ही श्वेत लोगों के घरों में मज़दूरी करके घर का खर्च चलाती थी। बाप की लापरवाही और क्रूरता के कारण वे बाल्यावस्था में ही पोलियो का शिकार हो गयीं। पांच साल की अवस्था में उनकी मां एक सस्ती-सी पहियों वाली कुर्सी खऱीद लायी और उन्हें एक स्कूल में छोड़ आयीं। सिंथिया ने जबसे बोलना शुरू किया था, वे बार-बार कहा करती थीं, मैं स्कूल जाऊंगी, मैं स्कूल जांऊगी। सिंथिया बड़ी समझदार और तीव्र बुद्धिवाली बच्ची थीं। वे अपनी कुर्सी को घसीटती हुई स्कूल चली जातीं। घर आ जातीं और पुस्तकें पढ़ती रहतीं। उनके शिक्षकगण उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। वे बड़ी संतोषी और धैर्यवान थीं। वे किसी हीन भावना से ग्रस्त नहीं हुईं। दूसरे बच्चों को भागते-दौड़ते देखकर वे अपनी विवशता और विकलांगता पर न कभी आंसू बहातीं, न परेशान होतीं और सिर झुकाये बड़ी निष्ठा और एकाग्रता से अध्ययन करती रहतीं। उन्होंने अपने स्कूल मे अपनी प्रतिभा की धाक बिठा दी थी। उन्हें हर वर्ष ईनाम मिला करता था। समय व्यतीत होता गया और सिंथिया १७ साल की हो गयीं। उन्होंने स्कूल की शिक्षा पूरी कर ली थी और अब यूनीवर्सिटी में दाख़िला लेना था। चूंकि उनकी श्रेष्ठ शैक्षिक योग्यता और प्रतिभा से सभी प्रभावित थे, इसलिए उन्हें छात्रवृत्ति मिल गयी और पांच साल तक वे यूनीवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण करती रहीं तथा प्रतिष्ठा के साथ उसे पूर्ण किया। फिर एक स्थानीय समाचार-पत्र शिकागो न्यूज़ में उन्हें नौकरी भी मिल गयी। यही वह ज़माना था, जब सिंथिया अमेरिका के एक प्रसिद्ध अश्वेत नेता मेलकॉम एक्स के चरित्र से परिचित हुर्इं। वह कुख्यात और जाना-पहचाना अपराधकर्मी और नशीले-पदार्थों का हबशी विक्रेता था। वह अनगिनत गंभीर अपराधों में लिप्त था। और जीवन का बड़ा हिस्सा जेलों में व्यतीत कर चुका था। $खुदा का करना यह हुआ कि मेलकॉम मुसलमान हो गया और इससे न केवल उसकी अपनी जिन्दगी में ज़बरदस्त इन्िकलाब आ गया, वह एक नेक इन्सान बन गया, बल्कि उसके प्रचार और प्रेरणा से हजारों अश्वेत लोगों की जि़न्दगियां भी बदल गयीं। उन्होंने सैकड़ों ऐसे स्वयंसेवक तैयार किये जो विशेषत: अश्वेतों को सन्मार्ग पर लाने और उनको नशे से छुटकारा दिलाने के लिए दिन-रात प्रयत्नशील रहते थे। यह एक नया आन्दोलन था, यह एक नया इन्कलाब था, जो धीरे-धीरे अमेरिका के अश्वेतों में आ रहा था, जो उन्हें सम्मानपूर्वक जि़न्दा रहना सिखा रहा था। सिंथिया मेलकॉम एक्स के दोनों पहलुओं से अवगत थीं, इसलिए उसके दिलो-दिमाग ने इस्लाम धर्म से भी गहरा प्रभाव ग्रहण किया था। चूंकि वे अध्ययनशील प्रवत्ति की थीं इसलिए उन्होंने इस्लाम के बारे में बहुत कुछ पढ़ डाला और उन्हें अपनी परिकल्पनाओं और मानव प्रवत्ति के सर्वथा अनुकूल पाया तो उसे स्वीकार कर लिया। एक दिन जबकि पहले की तरह उनका पिता शराब के नशे में धुत्त उनकी मां की पिटाई करने वाला था, उन्होंने अपने बाप को समझाना शुरू कर दिया और मां को धीरज बंधाने लगी और बातचीत की तेजी में बता दिया कि वे इस्लाम स्वीकार कर चुकी हैं।
इस वंृत्तात को खुद सिंथिया, बल्कि आमिना की ज़बानी सुनिए:
मेरे माता-पिता के लिए मुसलमान शब्द अपरिचित न था। मैं नहीं जानती कि इस्लाम और इस्लाम के अनुयायियों के बारे में अमेरिकियों का रवैया बिना रंग-नस्ल क्यों शत्रुतापूर्ण और विरोधपूर्ण हैं। मेरी ज़बान से यह सुनने के बाद कि मैं मुसलमान हो चुकी हूं, मेरे मां-बाप को अत्यन्त आश्चर्य हुआ। ख़ासतौर पर मेरी मां को बहुत दुख हुआ। उनकी यह प्रतिक्रिया तब बहुत परेशान करने वाली थी। मैं उन्हें एक उत्पीडि़त औरत समझती थी। मेरा ख्य़ाल था कि मेरे मुसलमान होने पर वह ज्य़ादा शोर न मचाएगी, किन्तु हुआ इसके विपरीत। मेरे पिता के चेहरे पर घृणा, तिरस्कार, उपहास, लापरवाही की झलक दिखाई दे रही थी और मेरी मां लगातार बोलती जा रही थी। आज जब वह दृश्य याद आता है, तो मैं बेइख़्ितयार मुस्करा देती हूं, परन्तु उस समय मेरी प्रतिक्रिया भिन्न थी। मैं यह महसूस करने लगी थी कि मैनें इस्लाम स्वीकार करने का ऐलान कुछ जल्दी कर दिया। इसका कारण यह न था कि मेरे ईमान में कोई कमी थी, बल्कि यह कि मैने यह फैसला किया था कि जब तक मैं मुसलमानों के तौर-तरीकों को परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से अपना नहीं लेती, तब तक इस्लाम स्वीकार करने का ऐलान नहीं करूंगी। मैं उस क्षण बहुत भावुक हो गई थी। अपने मुसलमान होने का जि़क्र बड़े जोश और जज्बे से कर दिया। मेरे पिता बड़बड़ाते हुए बाहर चल गये। मेरी मां मुझे समझाने लगीं। मंैने कहा--मम्मी जो होना था हो चुका। मैं जो $कदम आगे बढ़ा चुकी हूं वह पीछे नहीं हटा सकती। मेरी मां ने और अधिक सख्ती से समझाना-ब़ुझाना शुरू किया। मंैने उनसे कहा कि वह अपना समय अकारण बर्बाद कर रही हैं। मैं मुसलमान हो चुकी हूं और अब कुछ नहीं हो सकता। मेरी मां ने सोचा शायद मैं जि़द कर रही या भावुक हो गयी हूं। उन्होंने अपना लम्बा भाषण अधूरा छोड़ा और मुझे अकेली छोड़कर चली गयी। मैं मुसलमान क्यों हुई? यह बात मुझसे कई लोगों ने पूछी है और मैं कई बार जवाब दे चुकी हूं। इसके बावजूद मैं समझती हूं कि मुझे इस सवाल का जवाब बड़े सुकून और इत्मीनान से देना चाहिए।--- मेरे घरेलू हालात अमेरिका में हबशियों की समग्र परिस्थिति से अधिक मेरी विवशता और अपंगता ने मुझे इस्लाम की ओर प्रेरित किया। इसका विवरण भी सुन लें।
एक अखबार में काम करने के कारण मैं प्रतिदिन मेलकॉम एक्स और मुसलमान होने वाले अश्वेतों के सुधारवादी आन्दोलन के विषय में पढ़ती थी। चूंकि पोलियो के कारण मैं विवश और अपंग हो चुकी थी और सिवाय अध्ययन के और मेरा कोई कार्य नहीं था। इसलिए मुझमें सोचने-समझने की आदत बहुत बढ़ गयी थी। जब मैं पढ़ती कि मेलकॉम एक्स और उनके स्वयंसेवक अपने साथियों से नशा-सेवन की लत छुड़ाने में सफल हो रहे हैं, तो मुझे बड़ी हैरत होती। मैं समझती कि यह मात्र एक समाचार है, जिसमें सच्चाई नहीं है। लेकिन फिर भी मैं सोचती कि यह समाचार किस हद तक झूठा हो सकता है? मेरे पास मेरे अपने इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। मगर उस ज़माने में मैंने यह फैसला कर लिया कि मुझे इस्लाम के बारे मेें कुछ पढऩा चाहिए। मैंने कुछ पुस्तकें प्राप्त की और पढऩे लगी। इस्लाम के बारे में उन पुस्तकों ने मुझे अत्यन्त प्रभावित किया। जब मैंने यह पुस्तकें पढ़ लीं, तो मेरे दिल में कुरआन पढऩे का ख्य़ाल पैदा हुआ और मैंने अंग्रेजी में अनुदित कुरआन की एक प्रति प्राप्त कर ली। पवित्र कुरआन के इस अनुवाद ने मुझे एक अनुपम आत्मिक आनन्द प्रदान किया, जिसे मैं बयान नहीं कर सकती। आज मैं समझती हूं कि अगर कोई भी व्यक्ति दिलचस्पी, एकाग्रता और लगन से पवित्र कुरआन का अध्ययन करे तो वह इस पवित्र पुस्तक की सत्यता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। पवित्र कुरआन के अध्ययन ने मुझे कई दिन बेचैन रखा, मेरे दिल में एक अजीब तरह का भावनात्मक उतार-चढ़ाव पैदा हो गया था। जी चाहता कि अब मेलकॉम एक्स से मिलूं, मगर वे इस शहर से बहूत दूर थे। मैंने समाचार-पत्र के द्वारा यह पता लगाया कि यहां हमारे शहर में कौन ऐसा व्यक्ति है जो मुसलमानों का मार्गदर्शन करता है। उसका पता मुझे जल्द ही मिल गया। मैंने उस व्यक्ति, मुहम्मद यूसुफ को फोन किया और उससे मुलाकात के लिए समय मांगा। दूसरी ओर से मुझे बड़ी हमदर्द और नर्म आवाज़ सुनायी दी। मुहम्मद यूसुफ ने मुझसे कहा कि मैं जिस समय चाहूं उससे मिल सकती हूं। मैंने उन्हें बताया कि मैं कल दोपहर बाद उनसे मिलूंगी। समय निश्चित हो जाने के बाद मैंने संतोष की सांस ली। जब मैं अगले दिन मुहम्मद यूसुफ से मिलने गयी, तो वह मुझे देखकर कुछ परेशान हो गये। मैंने उनकी परेशानी के कारण को भांप लिया। वे किसी स्वस्थ और हष्ट-पुष्ट लड़की से मिलने की आशा रखते थे। जब उन्हें व्हील चेयर में बैठी चलने-फिरने में विवश मुझ जैसी लड़की दिखायी दी, तो वे कुछ परेशान से हो गये, लेकिन मेरी खुशदिली ने उनकी परेशानी को जल्दी खत्म कर दिया। मुहम्मद यूसुफ मेरी तरह ही अश्वेत थे। कभी उनका नाम जॉन ब्लेगडन था। अब वे मुहम्मद यूसुफ जैसे खूबसूरत नाम के मालिक थे। वे इस शहर के मुसलमानों के इमाम थे। वही मस्जि़द में नमाज़ पढ़ाते और वही कुरआन की शिक्षाओं पर प्रवचन करते थे। वे हमदर्दी भरे लहजे में मुझसे मेरे बारे में बातचीत करते रहे। बातों-बातों में बड़े गैर महसूस अन्दाज़ में उन्होंने मुझसे मेरे परिवार के बारे में सारी जानकारियां प्राप्त कर लीं। मैंने उनसे पूछा कि वे मुसलमान क्यों हुए थे? मुहम्मद यूसुफ मुस्करा दिए। फिर उन्होंने धीमे से बड़े मीठे लहजे में जवाब दिया- मैं इसलिए मुसलमान हुआ कि खुदा तआला कि यह मरजी थी कि वह मुझे सीधा रास्ता दिखाए। उनका वह जवाब मैं आज तक नहीं भूली हूं और जिन्दगी भर न भूल सकूंगी, क्योंकि मैं भी यही समझती हूं कि अल्लाह तआला जिस इन्सान को सीधे रास्ते पर लाना चाहता है, उसके दिल में इस्लाम के लिए मुहब्बत पैदा कर देता हैं। मुहम्मद यूसुफ ने मुझे बताया कि वे भी अश्वेतों के गरीब और पिछड़े इलाके में पैदा हुए थे। उन्होंने बचपन गरीबी और कंगाली में गुज़ारा। बड़े हुए तो एक ऐसे होटल में नौकर हो गये, जहां उन्हें बर्तन मांजने के लिए रखा गया था। मगर उनसे जरूरी काम और भी लिया जाता था। उन्हें कुछ पैकेट दे दिये जाते कि उन्हें अमुक जगह पहुंचा दें। इस काम के बदले उन्हें इनाम में एक-आधा डॉलर मिल जाता था। एक दिन उनके जी में आया कि एक पैकेट को खोलकर देखना चाहिए। जब उन्होंने खोलकर देखा तो उसमें उन्हें हशीश मिली। उन्होंने यह हशीश महंगे दामों में बेच दी और होटल वापस न गये। मगर होटल के प्रबंधकों ने उन्हें खोज निकाला, पैकेट मांगा और ज़ब पैकेट न मिला तो उनकी खूब पिटायी की। वे कई दिनों तक बिस्तर से न उठ सके। इस घटना के बाद वह गुनाहों की दुनिया में पहुंच गये। तीस वर्ष की उम्र तक उन्होंने ऐसा बुरा काम किया।...... हीरोइन और दूसरे नशीले पदार्थो का गुप्त धंधा करते-करते, $खुद भी इन नशीले पदार्थों के सेवन के आदी हो गये। उन्हें कई बार सज़ा हो चुकी थी। मगर वे सजा के भय से मुक्त हो चुके थे। एक बार जब वे जेल में थे तो कुछ लोग उनसे मिलने आये। ये स्वयंसेवक मुसलमान थे, जो कैदियों में इस्लाम का प्रचार कर रहे थे। उनके प्रचार से मुहम्मद यूसुफ अत्यन्त प्रभावित हुए और उनका जी चाहने लगा कि वह ससम्मान और निश्चिन्त जीवन व्यतीत करें। जब वे जेल से रिहा हुए तो बहुत बदल चुके थे। मगर उन्हें जि़न्दा रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था। वे कुछ भी नहीं जानते थे। इसलिए उन्होंने यही सोचा कि अब फिर उन्हें आपराधिक जीवन व्यतीत करके ही पेट पालना पड़ेगा। वही स्वयंसेवक जिन्होंने जेल में उनके विचारों को बदलने की कोशिश की थी, उनसे मिले। उन्होंने उनके लिए रोज़गार का बन्दोबस्त किया। कुछ नकद रकम दी, ताकि जब तक उन्हें वेतन नहीं मिलता, वह इस रकम से अपना समय बिताएं। वे उन्हें अपने साथ रखते। इस तरह मुहम्मद यूसुफ जो कभी जॉन ब्लेगडन थे, मुसलमान हो गये। इस्लाम के साथ उनके लगाव का यह हाल था कि एक साल में उन्होंने कुरआन मजीद अरबी में पढ़ लिया। इस राह में उन्हें बहुत सी-दि़क्कतें और परेशानियां पेश आयीं। मगर वे किसी परेशानी से न घबराये।
कुरआन मजीद की शिक्षा के बाद वे इस्लामी तौर-तरीकों और जीवन-शैली को अपनाने में कामयाब हो गये। चार साल बाद उन्हें उस इलाके में मुसलमानों का इमाम बना दिया गया। इमाम बनने के बाद उन्होंने अपनी कोशिशों से ज़मीन के लिए चन्दा जमा किया और वहां एक छोटी-सी मस्जि़द बनवा दी। उस मस्जि़द के निर्माण में खुद उन्होंने और दूसरे मुसलमानों ने हिस्सा लिया था। वे ख़ुद मज़दूरी करते और उसकी मज़दूरी न लेते थे। मैं मुहम्मद यूसुफ की जि़न्दगी और उनकी बातों से अत्यन्त प्रभावित हुई और उनसे कहा कि मैं मुसलमान होना चाहती हूं। मुहम्मद यूसुफ साहब ने पहली बार मुझे भरपूर नज़रों से देखा और बोले, खुदा मुबारक करे, मगर मुसलमान होना बहुत मुश्किल हैं। मैं हर मुश्किल पर क़ाबू पाऊंगी। अलहम्दुलिल्लाह, उन्होंने कहा, क्या तुम्हें कलिमा और नमाज़ आती है? मैंने न में सिर हिलाया, तो उन्होंने मुझे एक छोटी-सी किताब दी। उसमें रोमन लिपि में कलिमा और नमाज़ लिखी हुई थी। कहने लगे, इसे याद कर लो और अगर हो सके तो तीसरे पहर को मेरे पास थोड़ी देर के लिए आ जाया करो। मैंने कुछ दिनों में न केवल कलिमा और नमाज़ याद कर ली बल्कि उनके अर्थ भी समझ लिये। उस दौरान मैं मुहम्मद यूसुफ से भी मिलती रही और उनसे इस्लाम धर्म के बारे में जानकारियां हासिल करती रही। जुमा का दिन था। मस्जि़द में मैंने सभी मुसलमानों के सामने कलिमा पढ़ा और मुसलमान हो गयी। मेरा नाम आमिना रख दिया गया। मुसलमान होने के बाद मैंने पहला काम यह किया कि खाने के साथ थोड़ी-बहुत शराब पीने की जो आदत थी उसे छोड़ दिया। मैं सिगरेट भी पी लिया करती थी। यह भी छोड़ दी। और मुसलमान औरतों जैसा लिबास सिलने के लिए दे दिया। मैं समझती थी कि जब मैं मुसलमान औरतों की तरह लम्बे चोग़े मेें अपना शरीर छिपाऊंगी और सिर को भी ढांपूंगी तो व्हील चेयर में बैठी हुई हास्यास्पद दिखायी दूंगी। मैंने हर ताना और मज़ाक का सामना करने का फैसला कर लिया। जब मैं पहली बार मुसलमान औरतों का लिबास पहनकर घर से निकलने लगी तो मेरी मां ने मुझे हैरत से देखा और बोली, सिंथिया, क्या पहन रखा है तुमने उसके चेहरे पर तंज़ था। मेरे पिता ने भी, जो रात भर शराब पीने के बाद अब कुर्सी पर बैठे ऊंघ रहे थे, अपनी लाल-लाल आंखें खोलकर मुझे देखा और कहक़हा लगाया। मैंने कहा,मम्मी याद रखिए, मेरा नाम आमिना है, सिंथिया नहीं। आ-मिना-क्या नाम हुआ यह भला, मां ने कहा , लड़की तेरा दिमाग तो नहीं चल गया। मैंने अपनी मां को समझाने की कोशिश की कि मैं उन्हें बता चुकी हूं और अब मुसलमान की तरह विधिवत जिन्दगी की शुरुआत कर चुकी हूं। तुम्हारी जगह जहन्नम में है...... इससे पहले कि वह कुछ और कहतीं मैंने उसकी बात काटकर कहा, मम्मी आपको मेरे मामले में दखल देने की ज़रूरत नहीं। अगर कोई बात करनी है तो जब में दफ्तर से आऊंगी तो कर लेना। इस समय मुझे देर हो रही है। मैं व्हील चेयर को धकेलती हुई बाहर निकल गयी। हबशियों की उस गन्दी बस्ती में मुझे जिसने उस लिबास में देखा, वह पहले तो हैरान हुआ, फिर मज़ाक उड़ाने लगा। मगर मैंने किसीकी एक न सुनी और अपनी राह चलती रही। जब मैं अपने अखबार के दफ्तर पहुंची तो वहां भी अत्यन्त तीखी प्रतिक्रिया हुई। बहुत-से लोग मेरे चारों ओर जमा हो गये। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं मुसलमान हो गयी हूं और मुसलमान औरतें ऐसा ही लिबास पहनती हैं, तो कुछ लोग ख़ामोश हो गये और कुछ लोग बड़बड़ाते हुए चले गये। संयोग से उस दिन वेतन का दिन था। वेतन मिला तो मैंने उसका एक चौथाई हिस्सा अपने इलाके की मस्जि़द के में जमा करा दिया।
जब मैं घर लौटी तो मेरी मां मेरा इन्तज़ार कर रही थी। मेरे पिता भी घर पर मौजूद थे। मैं वेतन का आधा हिस्सा अपनी मां को दे दिया करती थी। उस रकम से मेरे पिता अपने नशे के लिए कुछ पैसे ऐंठ लिया करते थे। मैंने जब अपने वेतन की कुछ रकम अपनी मां को दी तो उसने हैरत से मुझे देखा और पूछा, तुमने इस बार दस डॉलर कम दिए हैं। हा,अब हर महीने आपको इतनी रकम मिलेगी। मैंने अपने वेतन का एक चौथाई मस्जि़द को देने का फैसला कर लिया है। मेरी यह बात सुनते ही वे मुझे, मुसलमानों और मस्जि़द को कोसने लगी। मैंने कोई जवाब देना उचित नहीं समझा और अपने कमरे में चली गयी। बहुत देर तक अपनी मां को बकते-झकते सुनती रही। बीच-बीच में मेरे पिता की आवाज़ भी सुनायी देती थी। अब सिंथिया हमारे हाथ से निकल गयी। मुसलमानों ने इसका दिमाग खराब कर दिया हैं। हमने तो कभी गिरजे को चन्दा नहीं दिया। यह वेतन का एक चौथाई मस्जि़द को देने लगी हैं। मेरे मां-बाप के नज़दीक मुसलमान लुटेरों से कम न थे, जो उनकी बेटी की कमाई लूटकर ले गये थे। धीरे-धीरे मैंने अपनी जि़न्दगी इस्लाम के नियमों और तौर-तरीकों के मुताबिक ढाल ली थी। वे लोग जो पहले मुझ पर उंगलियां उठाते थे, मुझसे लापरवाह हो गये। और फिर क्रिसमस का त्यौहार आ गया। हम चाहे कितने ही खराब और बदहाल क्यों न हों, क्रिसमस को ठाट-बाट से मनाने का इन्तिज़ाम ज़रूर करते हैं। क्रिसमस के दिन शराब पानी की तरह बहायी जाती है। जब मैंने मेहमानों के साथ शराब के प्याले को छूने से ही इन्कार कर दिया तो हमारे घर में $िकयामत बरपा हो गयी। पिता तो सुबह से नशे में धुत थे। मां भी दो-एक बार मेहमानों के साथ पी चुकी थी। नशे की हालत में वे मुझ पर बरसने लगे। मेहमान भी नशे में थे। वे भी, जो उनके मुंह में आया, बकने लगे।इन सबकी हालत दयनीय थी। मैंने सोचा कि मुझे इस कमरे से चले जाना चाहिए। मगर जब में अपनी व्हील चेयर को धकेल कर जा रही थी,तो एक मेहमान लडका और मेरे पिता मेरे पीछे लपके और व्हील चेयर के सामने खडे हो गये। मैंने कहा,रास्ता छोड़ दें,मुझे जाने दें। यह पी लो। फिर चली जाना, लड़के ने मेरे रास्ते से हटे बिना शराब का प्याला मेरे आगे किया। मैं लानत धिक्कार भेजती हंू इस पर। मेरे मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा लगा, जो मेरे पिता ने मारा था। मेरा सिर चकरा गया। आंखों में आंसू आ गये। मगर मेरे पिता और उस लड़के में तो जैसे शैतान की आत्मा घुस गयी थी। वे मुझे पीटने लगे। उन्होंने मुझे रूई की तरह धुन दिया। मैं चुपचाप यह अत्याचार सहती रही। वे गालियां बक रहे थे। नशे में उनके मुंह से झाग बह रहा था। जब वे थककर बैठ गये तो मैं किसी न किसी तरह अपने कमरे में पहुंच गयी। इस रात मैंने फैसला किया कि मुझे क्या करना है। मेरी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि मुझे अपनी मस्जि़द के इमाम मुहम्मद यूसुफ को अपनी सारी विपदा सुनानी चाहिए। और फिर यह घर छोड़ देना चाहिए। लेकिन ज्यों-ज्यों मेरा $गुस्सा और जोश ठंडा होता गया, मेरी सोच बदलती गयी। मैंने सोचा कि मुझे अपनी परेशानियां लेकर मुहम्मद युसूफ के पास नहीं जाना चाहिए। उनका हल जरूर तलाश करना चाहिए और अपने माता-पिता के साथ ही रहना चाहिए। उनका मुझ पर अधिकार है और मेरा भी यह कर्तव्य बनता है कि मैं उनकी जि़न्दगी बदलने की कोशिश करूं। अत: उस रोज मैंने एक महत्वपूर्ण फैसला किया और अगले दिन मैंने अपने इस फैसले से मस्जि़द के इमाम मुहम्मद यूसुफ को सूचित कर दिया। मैंने अखबार की नौकरी छोड़ दी और स्वयंसेविका बन गयी। मुझे साधारण-सा गुज़ारा भी मिलने लगा। जब मेरे मां-बाप को मेरे इस फैसले का ज्ञान हुआ, तो वे बहुत सटपटाए। वे यह सोच भी नहीं सकते थे कि मैं अच्छी-भली नौकरी छोड़ दूंगी। मैंने उनसे कहा कि वे चिन्ता न करें। उनको उनका हिस्सा मिलता रहेगा। मैं अखबारों के लिए लिखूंगी और जो पारिश्रमिक मुझे वहां से मिलेगा, वह में उनको दे दिया करूगीं। मेरे इस व्यावहारिक जीवन का आंरभ उस समय हुआ जब मैं मुसलमान स्वयंसेविका बन गयी। मुहम्मद युसूफ ने मुझे बहुत-से निर्देश दिये और जिस काम के लिए मुझे चुना गया, उस राह के ख़तरों से मुझे अवगत किया। मुझे खुद भी अन्दाज़ा था कि यह रास्ता कांटों से भरा है। मगर इस्लाम ने मुझे साहस दिया। इसके कारण मैं किसी खतरे पर ध्यान नहीं दे रही थी। मैं जेलों में जाने लगी। वहां मैं कैदियों से मिलती।उनके सामने इस्लाम की महिमा बयान करती। उनको उनकी जि़न्दगी के घिनौने पहलू दिखाकर उनको बेहतर जि़न्दगी गुज़ारने की सलाह देती। कुछ कैदी समय काटने के लिए मेरी बातों को ध्यान से सुनते। कुछ मेरा मज़ाक उड़ाते। उनमें ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने मेरी शारीरिक अपंगता पर भी कहकहे लगाये। मगर में तनिक भी भयभीत न हुई, न मेरी हिम्मत ने जवाब दिया। इन कैदियों में से एक हबशी कैदी अरबिन्तो भी था। उसने मेरी बातों का अच्छा प्रभाव ग्रहण किया और एक दिन कहने लगा, तुम बड़ी साहसी लड़की हो। अगर तुम वास्तव में चाहती हो कि बुराई का अन्त हो जाए तो बरनार्डो को खत्म कर दो। बरनार्डो कौन है? मैंने पूछा। बरनार्डो इस शहर के एक बड़े माफिया गिरोह का प्रमुख है। यही व्यक्ति है जो इस शहर में मादक द्रव्यों का एकाधिकारी है। अगर वह न हो तो इस शहर में लोगों को मादक-द्रव्य न मिले और लोग इसके आदी न हों। वह बड़ा खतरनाक आदमी है। आज मैं जिस हालत मैं पहुंचा हूं, उसका जिम्मेदार भी बरनार्डो है। मैं बरनार्डो से कैसे मिल सकती हूं। उसने मेरे कान में मुझे बरनार्डो का पता बता दिया। जब में जाने लगी, तो अरबिन्तो का लहजा बिल्कुल बदल गया था। वह अफसोस जताते हुए बोला, मुझसे गलती हुई कि मैंने तुमसे बरनार्डो का जि़क्र किया। तुम इन सारी बातों को भूल जाओ। तुम अन्दाज़ा नहीं कर सकती हो कि बरनार्डो कितना खतरनाक आदमी है। मगर मैं उससे मिलने का फैसला कर चुकी हूं, मैंने साहस के साथ कहा। तुम उससे मिलकर क्या करोगी? उसने पूछा। उसको सीधा रास्ता दिखाने की कोशिश करूंगी। वह हंसने लगा। उसके कहकहे दूर तक मेरा पीछा करते रहे। सुबह का समय था जब मैं वक्त तय किए बिना बरनार्डो के आलीशान घर के अन्दर दािखल हुई। उस घर को देखकर कोई व्यक्ति अनुमान नहीं कर सकता कि उस घर में रहने वाला व्यक्ति कोई बहुत बड़ा अपराधी है। तुम यहां क्या कर रही हो? एक नौकर ने मुझे रोककर पूछा। वह मेरे लिबास और मेरी व्हील चेयर को ध्यान से देख रहा था। मुझे मिस्टर बरनार्डो से मिलना है, मैंने कहा। तुम्हें? उसने कहकहे लगाकर कहा, मिस्टर बरनार्डो से मिलना इतना आसान नहीं। आखिर क्यों? मैंने कहा। वह भी इन्सान है और इन्सान इन्सान से मिला-जुला करते हैं। हम दोनों में तू-तू, मैं-मैं होने लगी। उसी समय एक अधेड़ उम्र का मज़बूत शरीर वाला आदमी एक कमरे से बाहर निकला और गुस्से से बोला, यह क्या हो रहा है और शोर क्यों मचा रखा है? नौकर ने उस आदमी के आगे सिर झुकाकर कहा, यह लड़की आपसे मिलने की जि़द कर रही थी। उसने पूछा-मुझसे क्या काम है? मैं आपसे एकान्त में बात करना चाहती हूं, मैंने कहा। बरनार्डो ने कुछ विस्मय से मेरी और देखा। फिर नौकर को वहां से जाने का इशारा किया। जब नौकर वहां से चला गया तो बरनार्डो ने बड़े अभिमान से कहा, मैं इस तरह किसी से मुलाकात नहीं करता हूं। तुम विक लांग हो, इसलिए रुक गया हूं। कहो, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं? मैंने उसकी और देखा और उसकी आखों में आंखे डालकर कहा, मिस्टर बरनार्डो क्या सचमुच आप इस विकलांग लड़की के किसी काम आना चाहते हैं? उसने जवाब देने से पहले कुछ सोचा फिर मुस्कराकर कहा, हां, कहो मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं? मैंने फिर उसकी आंखों में आंखें डाल दीं। मैंने महसूस किया कि मिस्टर बरनार्डो कुछ बेचैनी महसूस कर रहा है। वह मेरी नज़रों से नजरे़ं चुरा था। मैंने कहा-मिस्टर बरनार्डो अल्लाह ने आपको सब कुछ दिया है। अब आपको हिदायत की जरूरत है, सच्ची हिदायत की। लड़की मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो, मेरा वक्त बहुत कीमती है। दो मिनट में अपनी बात खत्म करो। मैंने जब बात शुरू की तो बरनार्डो का चेहरा ग़्ाुस्से से लाल हो गया। उसने गुस्से को दबाकर कहा, तुम पागल हो। निकल जाओ यहां से। तुम्हें किसने बताया है कि मैं यह काम करता हूं। मैं तुम्हें और तुमको बताने वाले को जि़न्दा न छा़ेडूगा। मैंने बड़े इत्मीनान से कहा, आपके इस गुस्से और जोश से ही जाहिर हो जाता है कि मुझे आपके बारे में जो सूचना मिली है वह ठीक है। तुम बकती हो। चली जाओ यहां से। मुझे तुम्हारी विकलांगता का ख्याल आ रहा है, नहीं तो.....। मैं जानती हूं मिस्टर बरनार्डो आप बहुत ताकतवर हैं। सारा शहर आपके चंगुल में फंसा हुआ है। ''आखिर तुम चाहती क्या हो? बरनार्डो ने गरजकर कहा। ''मैं चाहती हूं कि आप खुदा के बन्दों के फायदे के लिए अपना यह धंधा छोड़कर कोई और काम करें और अगर आपसे संभव नहीं तो फिर मुझ विकलांग लड़की पर दया करें। मुझे प्रतिदिन पांच मिनट मुलाकात का वक्त दे दिया करें।ÓÓ वह हैरत से मेरा मुंह ताकने लगा। फिर उसने कहकहा लगाया और बोला, ''तुम धुन की पक्की हो।...तुम कल फिर आ सकती हो इसी वक़्त।ÓÓ मैं वहां से निकली तो अत्यन्त संतुष्ट थी। बरनार्डो इटालवी मूल का था। दिल का खुला। उसको जिन्दगी में शायद ही मुझ जैसा कोई इन्सान मिला हो। वह मेरे व्यक्तित्व में रुचि लेने लगा। एक दिन के बाद दूसरा दिन...वह मुझे हर रोज बुलाता। मुझसे बातें करता। पांच मिनट की बातचीत की परिधि फैलकर घंटों तक पहुंच गयी। मैं उसके सामने इन्सानों का जिक्र करती। मादक द्रव्यों की विनाशकारिता बयान करती। इस्लाम की सत्यता का उल्लेख करती। धीरे-धीरे उसके विचारों में कुछ लचक पैदा होने लगी। ''आमिना! एक दिन उसने मुझसे कहा, ''मैं नही जानता कि तुम कौन हो? मुसलमान क्या होते हैं? मगर मैं एक बात जान गया हूं कि तुम मानव मनोविज्ञान को खूब समझती हो। ''इस्लाम इन्सानों का धर्म है, पूर्ण धर्म।Ó मैंने जवाब दिया, ''इसलिए इस्लाम मुसलमानों को मानव-मनोविज्ञान पर गहरी नजर रखने की हिदायत करता है। मैंने महसूस किया कि अब जब मैं उससे मिलने जाती हूं वह कुछ बेचैनी महसूस करने लगता है। उसने एक दिन मुझसे कहा, ''आमिना! वास्तव में इन्सान की जिन्दगी नश्वर है और इन्सान को दुनिया में अच्छे काम करने चाहिए। दूसरों का भला सोचना चाहिए। ''अलहम्दुलिल्लाह, मैंने जवाब दिया, ''खुदा का लाख-लाख शुक्र है कि यह बात आपके मन में बैठ गयी।
कुछ दिनों के बाद बरनार्डो ने अपना धंधा छोड़ दिया। वह सीधे रास्ते पर आ गया। उसने बिना हिचकिचाहट स्वीकार कर लिया कि वह माफिया गिरोह का सदस्य है। उसने माफिया के छिपे भेदों को खोलकर रख दिया। आपको याद होगा कि राष्ट्रपति फोर्ड के कार्यकाल में बरनार्डो के इस काम से अमेरिका में कितना तहलका मचा था! बरनार्डो ने पत्रकारों से कहा था, ''एक अपाहिज और चलने-फिरने से विवश लड़की ने मुझे यह उडऩशक्ति प्रदान की है कि मैंने बुराइयों की जंजीरों को तोड़ दिया है और स्वतंत्र वातावरण में उडऩे का साहस अपने अन्दर महसूस कर रहा हूं।ÓÓ
उस दिन मैं बहुत रोयी थी, जब मुझे खबर मिली कि बरनार्डो को जेल में गोली मार दी गयी है। उसको माफिया के आदमियों ने मार डाला था। उसका जिन्दा रहना उनके लिए खतरनाक साबित हो सकता था। वह एक ऐसा इन्सान था,जो सच्चाई की राह पर चल निकला था। वह जिन्दा रहता तो बड़ा सुधारक साबित हो सकता था। बरनार्डो के प्रायश्चित करने के कारण मुझे प्रेस ने बड़ी प्रसिद्धि दी थी। मेरे भाषण प्रकाशित होने लगे। पत्र-पत्रिकाओं में मेरे इंटरव्यू प्रकाशित हुए। टी.वी. और रेडियो पर मुझे बुलाया गया और मेरी सेवाओं की बड़ी प्रशंसा की गयी। विश्व हेवीवेट चैम्पियन मुहम्मद अली मुझसे मिलने आये। उन्होंने मेरी बड़ी प्रशंसा की। राष्ट्रपति फोर्ड ने मुझे ह्राइट हाउस में बुलाया और मेरी सराहना की। इस शोहरत और इज्जत के बावजूद मुझमें घमंड पैदा नहीं हुआ, क्योंकि घमंड अल्लाह को पसन्द नहीं है। इस्लाम ने मेरे जीवन में जो परिवर्तन पैदा किया,मैं सारी दुनिया में फैला देना चाहती हूं और अगर यह मेरे वश में नहीं तो मेरे दिल में यह इच्छा जरूर है कि इस्लाम की बरकतों से अमेरिका के अश्वेत लोग अवश्य लाभान्वित हों। मेरे पिता हर नशा छोड़ चुके हैं। मेरी मां मेरी इज्जत करती हैं, यद्यपि उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। तथापि उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आ चुका है। पिछले कुछ वर्षों में मेरी कोशिशों से तीन सौ व्यक्तियों ने मादक-द्रव्यों से तौबा की है और इक्कीस मर्दों और औरतों ने इस्लाम ग्रहण किया है। मैं एक अपाहिज औरत हूं। मगर मैं अपने आपको अपाहिज नहीं समझती, क्योंकि मेरा ईमान है कि जो व्यक्ति मुसलमान हो जाए, वह कभी अपाहिज नहीं हो सकता, क्योंकि खुदा उसका सहारा बन जाता है। मेरी जिन्दगी इस्लाम को समर्पित हो चुकी है। मैं इस्लाम ही के लिए काम करूंगी और इस्लाम की रूह (आत्मा) इन्सानों में फूंक देना चाहती हूं जब भी कोई इन्सान बुराई का रास्ता छोड़ देता है, मैं तो समझती हूं कि इस्लाम की जीत हुई है।-तो यह है मेरी कहानी-सिंथिया से आमिना बनने की।