शनिवार, 30 नवंबर 2013

नेपाल की अभिनेत्री पूजा लाम्बा इस्लाम की शरण में

नेपाल की मशहूर अभिनेत्री और मॉडल 31 वर्षीय पूजा लाम्बा ने लगभग तीन साल पहले इस्लाम अपना लिया। उनके इस्लाम अपनाने से भारत और नेपाल के कई लोग हैरत में हैं। बौद्ध परिवार में पली बढ़ी पूजा लाम्बा ने काठमांडू में इस्लाम कुबूल करने का ऐलान किया। पेश है उस दौरान पूजा लाम्बा से हुइ बातचीत के प्रमुख अंश।

किस बात से प्रभावित होकर आपने इस्लाम अपनाया?
मैं बौद्ध परिवार में पैदा हुई। एक साल पहले मैंने दूसरे धर्मों का अध्ययन करने का इरादा किया। मैंने हिंदू, ईसाई और इस्लाम मजहब का तुलनात्मक रूप में अध्ययन किया। विभिन्न धर्मों को समझने और जांचने के दौरान ही मैं कतर और दुबई गई और वहां मैं इस्लामिक सभ्यता से बेहद प्रभावित हुई। इस्लाम की एक बहुत बड़ी खूबी एक ईश्वर को मानना और उसी पर पूरी तरह यकीन करना है। एक ईश्वर को लेकर ऐसा मजबूत यकीन मैंने दूसरे धर्मो में नहीं देखा।
पूरी दुनिया का मीडिया इस्लाम के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहा है और इस्लाम को आंतकवाद बढ़ाने वाले धर्म के रूप में पेश कर रहा है। क्या आप मीडिया के इस दुष्प्रचार से प्रभावित नहीं हुई?
सच्चाई यह है कि इस्लाम के खिलाफ मीडिया के दुष्प्रचार के कारण ही मैं इस्लाम को अपना पाई, क्योंकि मैंने अध्ययन के दौरान इस्लाम को मीडिया के दुष्प्रचार के विपरीत एक अच्छा मजहब पाया और अब मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि इस्लाम दुनिया का एकमात्र ऐसा मजहब है जो इंसाानियत और शांति को बढ़ावा देता है और इंसाफ की बात करता है।
आप फिल्मी दुनिया से जुड़ी रही हैं और आपसे जुड़े कई स्कैंडल मीडिया में आए हैं। एक बार तो आपने खुदकुशी करने की कोशिश भी की। आप इन मामलों में कुछ बताएंगी?
मेरी निजी जिंदगी के बारे में नेगेटिव छापकर मुझे  बदनाम करने के मामले में मैं मीडिया को दोष नहीं देना चाहूंगी क्योंकि यह तो मीडिया ने अपना बिजनेस बना रखा है। दरअसल मेरी तीन बार शादी हुई थी। मेरे पहले पति से मेरे एक बेटा है जो मेरी मां के साथ रहता है। मीडिया ने मेरे से जुड़ी बातों को जिस तरह उछाला उसको लेकर मैं सदमे में थी। लोगों को लगता था कि मशहूर होने के लिए मैं ही ऐसा कुछ कर रही हूं। हकीकत यह है कि इस सबके चलते मैं दुखी थी और खुदकुशी करना चाहती थी। इस बीच मैं अपने दोस्तों के साथ धार्मिक किताबें पढऩे लगी और इसका नतीजा निकला कि मैंने इस्लाम अपना लिया। मैं अब अपने गुजरे वक्त को पूरी तरह भूला देना चाहती हूं क्योंकि अब मैं बेहद खुश हूं और सम्मानजनक जिंदगी गुजार रही हूं।
पूजा जी, इस्लाम अपनाने के बाद आपकी जिंदगी में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। आप हिजाब (पर्दा) करती हैं, शराब और धुम्रपान आपने छोड़ दिया है। क्या आप अल्लाह से अपने पिछले गुनाहों की  तौबा कर रही हैं?
प्लीज अब आप मुझे पूजा मत कहिए। पूजा मेरा पुराना नाम था और अब तो मैं आमिना फारुकी हूं। दरअसल इस्लाम अपनाने से पहले मैं बहुत दुखी और तनावपूर्ण जिंदगी गुजार रही थी। शराब और सिगरेट ही मेरा सहारा थी। शराब की इतनी आदी थी कि कई बार कुछ होश ही नहीं रहता था। मैं तनावपूर्ण जिंदगी बसर कर रही थी और मेरी जिंदगी में अंधकार ही अंधकार छाया हुआ था। लेकिन इस्लाम ने मुझे  इन हालात और बुराइयों से उबारा और अब मैंने शराब और सिगरेट पीना छोड़ दिया है। अब मैं इस्लाम के मुताबिक अपनी जिंदगी गुजार रही हूं।
इस्लाम अपनाने के मामले में आप किनसे प्रेरित हुई?
दरअसल बौद्ध धर्म से जुड़े मेरे कुछ कुछ दोस्तों ने इस्लाम अपना लिया था। उन दोस्तों ने जब मुझे  दुखी और परेशान देखा तो उन्होंने मुझे  इस्लाम से जुड़ी बातें बताईं। इस्लाम की शिक्षाओं से मुझे अवगत कराया। मैं इस्लाम का अध्ययन करने लगी। एक बार मैंने अपने दोस्त का इस्लाम पर लेक्चर सुना इससे मैं बेहद प्रभावित हुई। इस लेक्चर ने मेरे दिल की गहराइयों को छुआ। अब मुझे  किसी शख्स से किसी तरह का कोई डर नहीं रहा सिवाय एक अल्लाह के। और फिर मैंने उसी दिन इस्लाम अपना लिया।
इस्लाम अपनाने पर आपके परिवार वालों की क्या प्रतिक्रिया थी?
इस्लाम अपनाने के बाद मैंने दार्जिलिंग, इंडिया में रहने वाले मेरे परिवार को इस्लाम अपनाने की सूचना दी। मेरी मां ने मेरा पूरी तरह सहयोग किया। मेरे परिवार वाले बोले- तुमने सही रास्ता चुना है और अब तुम खुश हो तो हम भी तुम्हें खुश देखकर खुश हैं। मैं अब पूरी तरह बदल गई हूं और मैंने अपनी सारी बुरी आदतों को छोड़ दिया है। मेरे में आए इन बदलावों को लेकर मेरे परिवार वाले बेहद खुश हैं।
 इस्लाम अपनाने के मामले में मीडिया तो यह कर रहा है कि आपको किसी मुस्लिम शख्स से प्यार हो गया और आप उससे शादी कर चुकी है, इसलिए आपने इस्लाम अपनाया है। क्या यह सच है?
यह बेतुकी खबर है। मेरे कुछ मुस्लिम दोस्त हैं। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि मुझे  उनमें से किसी से प्यार हो गया और मैंने उससे शादी करने की वजह से इस्लाम अपनाया। हां यह जरूर है कि इस्लाम अपनाने के बाद भविष्य में अब मैं किसी मुस्लिम शख्स से ही शादी करूंगी। जब भी मैं शादी करने का निश्चय करूंगी, सबको इसकी जानकारी दूंगी।
साक्षात्कार-अब्दुस्सबूर नदवी
यह साक्षात्कार 6 नवंबर 2010 को साक्षात्कारकर्ता के ब्लॉग पर पब्लिश हुआ था।
http://anadvi.blogspot.in/2010/11/islam-is-very-great-religion-pooja-lama.html

इस्लामी विरोधी डच राजनेता ने अपनाया इस्लाम

क्या ये संभव है कि जीवन भर आप जिस विचारधारा का विरोध करते आए हों एक मोड़ पर आकर आप उसके अनुनायी बन जाएं. कुछ ऐसा ही हुआ है नीदरलैंड में.लंबे समय तक इस्लाम की आलोचना करने वाले डच राजनेता अनार्ड वॉन डूर्न ने अब इस्लाम धर्म कबूल लिया है.
अनार्ड वॉन डूर्न नीदरलैंड की घोर दक्षिणपंथी पार्टी पीवीवी यानि फ्रीडम पार्टी के महत्वपूर्ण सदस्य रह चुके हैं. यह वही पार्टी है जो अपने इस्लाम विरोधी सोच और इसके कुख्यात नेता गिर्टी वाइल्डर्स के लिए जानी जाती रही है

मगर वो पांच साल पहले की बात थी. इसी साल यानी कि 2013 के मार्च में अर्नाड डूर्न ने इस्लाम धर्म क़बूल करने की घोषणा की.
 नीदरलैंड के सांसद गिर्टी वाइल्डर्स ने 2008 में एक इस्लाम विरोधी फ़िल्म 'फ़ितना' बनाई थी. इसके विरोध में पूरे विश्व में तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं थीं.
 "मैं पश्चिमी यूरोप और नीदरलैंड के और लोगों की तरह ही इस्लाम विरोधी सोच रखता था. जैसे कि मैं ये सोचता था कि इस्लाम बेहद असहिष्णु है, महिलाओं के साथ ज्यादती करता है, आतंकवाद को बढ़ावा देता है. पूरी दुनिया में इस्लाम के ख़िलाफ़ इस तरह के पूर्वाग्रह प्रचलित हैं."

इंग्लैंड की महिला पुलिस अफसर ने अपनाया इस्लाम

 अट्ठाइस वर्षीय पुलिस अधिकारी जेने केम्प ने घरेलू हिंसा से पीडि़त एक मुस्लिम महिला की मदद के दौरान इस्लामिक आस्था और विश्वास के बारे में जानने का निश्चय किया।  उन्होंने इस्लाम का अध्ययन किया और फिर इस्लाम अपनाकर मुसलमान बन गईं।
दो बच्चों की मां जेने केम्प ने बताया कि पुलिस अधिकारी के रूप में घरेलू हिंसा से पीडि़त एक मुस्लिम महिला की मदद के दौरान उसने इस्लाम को जाना और फिर इस्लाम से प्रभावित होकर इस्लाम कुबूल कर लिया।
इस्लाम के अध्ययन के दौरान केम्प ट्विटर पर कई मुस्लिमों के सम्पर्क में आईं, उनसे कई बातें जानीं और इस सबके बाद उन्होंने अपना कैथोलिक धर्म छोड़कर एक साल पहले इस्लाम धर्म अपना लिया और अब वे पूरी तरह इस्लाम के मुताबिक अपनी जिंदगी गुजार रही हैं। वे एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के रूप में गश्त पर निकलती हैं लेकिन वे पूरी तरह इस्लामी हिजाब में होती हैं और अपनी ड्यूटी के समय को एडजेस्ट करके वे नमाज पढऩा नहीं भूलती हैं।
सात वर्षीय बेटी और नौ वर्षीय बेटे की सिंगल मदर जेने ने पिछले साल आधिकारिक रूप से इस्लाम अपना लिया और अपना नाम जेने केम्प से अमीना रख लिया। वे अपना  खाना खुद बनाती हैं ताकि वह पूरी तरह हलाल खाना हो।

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

ईसाई धर्मगुरु मुसलमान क्यों बन गए?

'पादरियों ने  अपनाया इस्लाम' किताब में दुनिया के सात देशों के ग्यारह ईसाई पादरियों और धर्मप्रचारकों की इस्लाम अपनाने की दास्तानें हैं। गौर करने वाली बात है कि ईसाईयत में गहरी पकड़ रखने वाले ये ईसाई धर्मगुरु आखिर इस्लाम अपनाकर मुसलमान क्यों बन गए? आज जहां इस्लाम को लेकर दुनियाभर में गलतफहमियां हैं और फैलाई जा रही हैं, ऐसे में यह किताब मैसेज देती है कि इस्लाम वैसा नहीं है जैसा उसका दुष्प्रचार किया जा रहा है। पुस्तक पढऩे पर आपको मालूम होगा कि ये ईसाई पादरी अपने धर्म के प्रचार में जुटे थे और इनमें से कई तो ऐसे थे जो मुसलमानों को ईसाईयत की तरफ दावत दे रहे थे। लेकिन इस्लाम के रूप में जब सच्चाई इनके सामने आई तो इन्होंने इसे अपना लिया।  आज इस्लाम कुबूल करने वालों में एक बड़ी तादाद ईसाई पादरियों और धर्मप्रचारकों की है। ईसाई धर्मज्ञाताओं का इस्लाम को गले लगाने के बारे में कुरआन चौदह सौ साल पहले ही उल्लेख कर चुका है। गौर कीजिए कुरआन की इन आयतों पर -
तुम ईमान वालों का दुश्मन सब लोगों से बढकर यहूदियों और मुशरिकों को पाओगे और ईमान वालों के लिए मित्रता में सबसे निकट उन लोगों को पाओगे जिन्होंने कहा कि -हम ईसाई हैं।  यह इस कारण कि ईसाईयों में बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं। और इस कारण कि वे अहंकार नहीं करते। जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आखें आंसुओं से छलकने लगती हैं । इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है।  वे कहते हैं-हमारे रब, हम ईमान ले आए। इसलिए तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले। 
                                                               (5 : 82-83)

यहां पेश हैं किताब के कुछ अंश-
1 ब्रिटेन के अन्य लोगों की तरह पहले मुसलमानों को लेकर मेरा भी यही नजरिया था कि मुसलमान आत्मघाती हमलावर, आतंकवादी और लड़ाकू होते हैं। दरअसल ब्रिटिश मीडिया मुसलमानों की ऐसी ही तस्वीर पेश करता है। इस वजह से मेरी सोच बनी हुई थी कि इस्लाम तो उपद्रवी मजहब है। काहिरा में मुझो एहसास हुआ कि इस्लाम तो बहुत ही  खूबसूरत धर्म है-  
                        इदरीस तौफीक-इंग्लैण्ड-पूर्व कैथोलिक ईसाई    पादरी- पेज नं-28

शनिवार, 29 जून 2013

ईसाई धर्म प्रचारक बन गया कुरआन का मुरीद

एक अहम ईसाई धर्म प्रचारक कनाडा के गैरी मिलर ने इस्लाम अपना लिया और वे इस्लाम के लिए एक महत्वपूर्ण संदेशवाहक साबित हुए। मिलर सक्रिय ईसाई प्रचारक थे और बाइबिल की शिक्षाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। वे गणित को काफी पसंद करते थे और यही वजह है कि तर्क में मिलर का गहरा विश्वास था।

एक अहम ईसाई धर्म प्रचारक कनाडा के गैरी मिलर ने इस्लाम अपना लिया और वे इस्लाम के लिए एक महत्वपूर्ण संदेशवाहक साबित हुए। मिलर सक्रिय ईसाई प्रचारक थे और बाइबिल की शिक्षाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। वे गणित को काफी पसंद करते थे और यही वजह है कि तर्क में मिलर का गहरा विश्वास था। एक दिन गैरी मिलर ने कमियां निकालने के  मकसद से कुरआन का अध्ययन करने का निश्चय किया ताकि वह इन कमियों को आधार बनाकर मुसलमानों को ईसाइयत की तरफ बुला सके और उन्हें  ईसाई बना सके। वे सोचते थे कि कुरआन चौदह सौ साल पहले लिखी गई एक ऐसी किताब होगी जिसमें रेगिस्तान और उससे जुड़े कहानी-किस्से होंगे। लेकिन उन्होंने कुरआन का अध्ययन किया तो वह दंग रह गए। कुरआन को पढ़कर वह आश्चर्यचकित थे। उन्होंने कुरआन के अध्ययन में पाया कि दुनिया में कुरआन जैसी कोई दूसरी किताब नहीं है। पहले डॉ. मिलर ने सोचा था कि कुरआन में पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. के मुश्किलभरे दौर के किस्से होंगे जैसे उनकी बीवी खदीजा रजि. और उनके बेटे-बेटियों की मौत से जुड़े किस्से। लेकिन उन्होंने कुरआन में ऐसे कोई किस्से नहीं पाए बल्कि वे कुरआन में मदर मैरी के नाम से पूरा एक अध्याय देखकर दंग रह गए।

इस्लाम में है अमेरिकी रंग-भेद की समस्या का समाधान: मेलकॉम एक्स

यह एक अफ्रो-अमेरिकन  जाने-माने क्रांतिकारी मेलकॉम एक्स की इस्लाम का अध्ययन करने और फिर इसे अपनाने  की दास्तां है। मेलकॉम एक्स ने अमेरिका की रंग-भेद की समस्या का समाधान इस्लाम में पाया। मेलकॉम एक्स कहता था-मैं एक मुसलमान हूं  और सदा रहूंगा। मेरा धर्म इस्लाम है।
मशहूर मुक्केबाज मुहम्मद अली के साथ मेलकॉम
जाने-माने और क्रांतिकारी शख्स मेलकॉम एक्स का  जन्म 19 मई 1925 को नेबरास्का के ओहामा में हुआ था। उसके माता-पिता ने उसको मेलकॉम लिटिल नाम दिया था। उसकी मां लुई नॉर्टन घरेलू महिला थी और उसके आठ बच्चे थे। मेलकॉम के पिता अर्ल लिटिल स्पष्टवादी बेपटिस्ट पादरी थे। अर्ल काले लोगों के राष्ट्रवादी नेता मारकस गेर्वे के कट्टर समर्थक थे और उनके कार्यकर्ता के रूप में जुड़े थे। उनके समर्थक होने की वजह से अर्ल को गोरे लोगों की तरफ से धमकियां दी जाती थीं, इसी वजह से उन्हें दो बार परिवार सहित अपने रहने की जगह बदलनी पड़ी। मेलकॉम उस वक्त चार साल के थे। गोरे लोगों ने अर्ल के लॉन्सिग, मिशिगन स्थित घर को जलाकर राख कर दिया और इस हादसे के ठीक दो साल बाद अर्ल लिटिल का कटा-पिटा शव शहर के ट्रॉली-ट्रेक के पार पाया गाया। इस हादसे के बाद उनकी पत्नी और मेलकॉम की मां लुई का मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया और उसे मनोचिकित्सालय में भर्ती कराना पड़ा। मेलकॉम की उम्र उस वक्त छह साल थी। ऐसे हालात में लुई के इन आठ बच्चों को  अलग-अलग अनाथालय की  शरण लेनी पड़ी।
मेलकॉम बचपन से ही चतुर और होशियार विद्यार्थी था। वह हाई स्कूल में क्लॉस में टॉप रहा। लेकिन जब उसने अपने प्रिय अध्यापक से वकील बनने की अपनी मंशा जाहिर की तो वह टीचर बोला-तुम जैसे नीग्रो स्टूडेंट के लिए वकील बनने के सपने देखना सही नहीं है। इसी सोच के चलते मेलकॉम की पढ़ाई में रुचि कम हो गई  और पंद्रह साल की उम्र में मेलकॉम ने पढ़ाई छोड़ दी। इस बीच मेलकॉम गलत लोगों की संगत में फंस गया और मादक पदार्थों के कारोबारियो से जुड़ गया। गलत संगत के चलते ही बीस साल की उम्र में धोखाधड़ी और चोरी के एक मामले में उसे सात साल की सजा हुई। जेल से बाहर आने पर उसने नेशन ऑफ इस्लाम के बारे में जाना। नेशन ऑफ इस्लाम से जुड़कर उसने इसके संस्थापक अलीजाह मोहम्मद की शिक्षाओं का अध्ययन किया और इसी के चलते 1952 में उसमें काफी बदलाव आ गया।

गुरुवार, 9 मई 2013

श्रीलंकाई ईसाई पादरी इस्लाम की शरण में

जॉज एंथोनी श्रीलंका में कैथोलिक पादरी थे। एंथोनी की इस्लाम कबूल करने और अपना नाम अब्दुल रहमान रखने की दास्तां बड़ी रोचक और दिलचस्प है।  एक ईसाई पादरी के रूप में उनकी बाइबिल की शिक्षा पर अच्छी पकड़ थी। वे आज भी फर्राटे से बाइबिल की कई आयतों को कोट करते हैं। बाइबिल अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि बाइबिल में कई विरोधाभास हैं। वे सिंहली भाषा में बाइबिल की उन आयतों का जिक्र करते हैं जो संदेहास्पद और विरोधाभाषी हैं।
वे कहते हैं कि बाइबिल में पैगम्बर मुहम्मद सल्ल.की भाविष्यवाणी की गई है। अब्दुल रहमान कहते हैं कि ईसाई ईसा मसीह को गॉड मानते हैं जबकि इसके विपरीत पवित्र बाइबिल में उन्हें एक इंसान के रूप में बताया गया है।
अब्दुल  रहमान कहते हैं कि ईसाइयत, बौद्ध धर्म और अन्य दूसरे धर्मों में ईश्वर द्वारा पैगम्बर भेजे जाने की अवधारणा इतनी स्पष्ट और प्रभावी नहीं है बल्कि कई पैगम्बारों के मामले में ये धर्म खामोश हैं जबकि इस्लाम में सभी पैगम्बरों को मानना और उन्हें पूरा-पूरा सम्मान देना जरूरी है। इस्लाम की यह अवधारणा और नजरिया हर किसी को प्रभावित करता है और उस पर अपना असर छोड़ता है।
अब्दुल रहमान कहते हैं कि रोमन कैथोलिक पादरी पर शादी का प्रतिबंध लगाने के पीछे कोई कारण समझ में नहीं आता जबकि ईसाइयों के अन्य कई दूसरे वर्गों के पादरी शादी कर सकते हैं। अब्दुल  रहमान ईसाइयत से जुड़े ऐसे ही विरोधाभास और शंकाओं पर विचार मग्र और सोच विचार कर रहे थे कि इस बीच उन्हें एक ऑडियो कैसेट हासिल हुई। यह ऑडियो कैसेट श्रीलंका के ईसाई पादरी शरीफ डी. एल्विस के बारे में थी जिन्होंने ईसाइयत छोड़कर इस्लाम अपना लिया था। इस्लामिक विद्वान अहमद दीदात की कई ऑडियो कैसेट्स  से भी अब्दुल रहमान  बेहद प्रभावित हुए। वे लगातार सच्चाई की तलाश में जुटे रहे और फिर एक दिन फादर जॉर्ज एंथनी इस्लाम अपनाकर अब्दुल रहमान बन गए।

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

आखिर ये शिक्षित महिलाएं मुसलमान क्यों हो गईं?

इस्लाम पर आरोप लगाया जाता है कि यह महिलाओं को उनका हक नहीं देता। अगर आप भी ऐसी ही सोच रखते हैं तो आपको यह किताब जरूर पढऩी चाहिए। यह किताब पढि़ए और जानिए आखिर विकसित देशों की इन पढ़ी लिखी महिलाओं ने  इस्लाम क्यों अपना लिया?
आखिर इस्लाम में इनको ऐसा क्या लगा कि इन्होंने अपना मूल धर्म छोड़कर इसे कबूल किया और कई तरह की परेशानियों के बावजूद वे इस्लाम पर डटी रहीं। इनको कई तरह से प्रताडि़त किया गया और इनको काफी कुछ खोना भी पड़ा लेकिन इन्होंने इस्लाम का दामन नहीं छोड़ा।इस किताब में जिक्र है दुनिया के विकसित मुल्कों से ताल्लुक  रखने वाली अस्सी शिक्षित महिलाओं का जिन्होंने इस्लाम अपनाया।
किताब का  नाम है- हमें खुदा कैसे मिला।
पढि़ए इस किताब को और सच्चाई से रूबरू होइए।


हमें खुदा कैसे मिला by islamicwebdunia

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

ईसाई पादरी अपना रहे हैं इस्लाम

शायद आप यकीन ना करें लेकिन हकीकत यही है कि इस्लाम की गोद में आने वाले लोगों में एक बड़ी तादाद ईसाई  पादरियों की है। यह किताब इसी सच्चाई को आपके सामने पेश करती है। यह ईसाई किसी एक मुल्क या इलाके  विशेष के नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों के हैं। अंगे्रजी की इस किताब में 18  ईसाई पादरियों का जिक्र हैं जिन्होंने सच्चे दिल से इस्लाम की सच्चाई को कुबूल किया और ईसाईयत को छोड़कर इस्लाम को गले लगा लिया।
इस किताब में इनके वे इंटरव्यू शामिल किए गए हैं जिसमें उन्होंने बताया कि आखिर उन्होंने इस्लाम क्यों अपनाया। उनकी नजर में इस्लाम में ऐसी क्या खूबी थी कि उन्होंने पादरी जैसे सम्मानित ओहदे का त्यागकर इस्लाम को अपना लिया।
पुस्तक  में शामिल ये अट्ठारह पादरी ग्यारह  देशों  के हैं। इनमें शामिल हैं अमेरिका के यूसुफ एस्टीज, उनके  पिता, मित्र पेटे, स्यू वेस्टन, जैसन कू्रज, राफेल नारबैज, डॉ. जेराल्ड डिक्र्स, एम. सुलैमान, कनाडा के डॉ. गैरी मिलर, ब्रिटेन के इदरीस तौफीक, ऑस्ट्रेलिया के सेल्मा ए कुक, जर्मनी के डॉ. याह्या ए.आर. लेहमान, रूस के विचैसलव पॉलोसिन, इजिप्ट के इब्राहीम खलील, स्पैन के एंसलम टोमिडा, श्रीलंका के जॉर्ज एंथोनी , तंजानिया के मार्टिन जॉन और ब्रूंडी की मुस्लिमा।
  • इस्लाम अपनाने वाले ये पादरी वे हैं जिन्होंने हाल ही के दौर में इस्लाम को अपनाया। पढि़ए इस किताब को और जानिए इस्लाम की सच्चाई इन पूर्व पादरियों की जुबान से।
  • इस किताब को यहां पेश करने का मकसद इस्लाम से जुड़ी लोगों की गलतफहमियां दूर करना और इस्लाम की सच्चाई को बताना है, मकसद किसी भी मजहब का मजाक उड़ाना नहीं है।
  • क्लिक कीजिए और रूबरू होइए इस किताब से

    Eighteen Priests Journey From Church to Mosque

बुधवार, 1 अगस्त 2012

इस इसाई पादरी ने आखिर अपना धर्म क्यों बदल लिया?

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ब्रिटेन के पूर्व कैथोलिक ईसाई पादरी इदरीस तौफीक कुरआन से इतने हुए कि उन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया।
ईमानवालों के साथ दुश्मनी करने में यहूदियों और बहुदेववादियों को तुम सब लोगों से बढ़कर सख्त पाओग। और ईमानवालों के साथ दोस्ती के मामले में सब लोगों में उनको नजदीक पाओगे जो कहते हैं कि हम नसारा (ईसाई) हैं। यह इस वजह से है कि उनमें बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं और इस वजह से कि वे घमण्ड नहीं करते।
जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें आंसुओं से छलकने लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है। वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले।          (सूरा:अल माइदा ८२-८३)
कुरआन की ये वे आयतें है जिन्हें इंग्लैण्ड में अपने स्टूडेण्ट्स को पढ़ाते वक्त इदरीस तौफीक बहुत प्रभावित हुए और उन्हें इस्लाम की तरफ लाने में ये आयतें अहम साबित हुईं।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

इस्लाम कबूल किए जाने वाला धर्म

प्रोफेसर अब्दुल्लाह बैनिल अमरीका
प्रोफेसर बैनिल हैविट अमरीका के  एक मशहूर विचारक और लेखक रहे हैं। उनकी गिनती अमरीका के इस्लाम कबूल करने वाले अहम लोगों में की जाती है। उनका इस्लामी नाम अब्दुल्लाह हसन बैनिल है। इस लेख में उन्होंने इस्लाम की उन खूबियों का जिक्र  किया है जिनसे वे बेहद प्रभावित हुए।
मेरा इस्लाम कबूल करना कोई ताज्जुब की बात नहीं है न ही इसमें किसी तरह के लालच का कोई दखल है। मेरे खयाल में यह जहन की फितरती तब्दीली और उन धर्मों का ज्यादा अध्ययन करने का नतीजा है जो इंसानी अक्लों  पर काबिज है। मगर यह बदलाव उसी शख्स में  पैदा हो सकता है जिसका दिल व दिमाग धार्मिक पक्षपात और पूर्वाग्रहों से ऊपर उठा हुआ हो और साफ दिल से अच्छे और बुरे में अंतर कर सकता हो।

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

पादरी जो मुसलमान हो गया

इब्राहिम खलील अहमद जिनका पुराना नाम खलील फिलोबस था, पहले इजिप्ट के कॉप्टिक पादरी थे। फिलोबस ने धर्मशास्त्र में प्रिंसटोन यूनिवर्सिटी से एम ए किया। इस्लाम को गलत रूप में पेश करने के मकसद से फिलोबस ने इसका अध्ययन किया। वे इस्लाम में कमियां ढूढना चाहते थे लेकिन हुआ इसका उलटा। वे इस्लाम से बेहद प्रभावितहुए और उन्होने अपने चार बच्चों के साथ इस्लाम कबूल कर लिया।
जानिए खलील इब्राहिम आखिर कैसे आए इस्लाम की गोद में?मैं १३जनवरी १९१९को अलेक्जेन्डेरिया में पैदा हुआ था। मैंने सैकण्डरी तक की शिक्षा अमेरिकन मिशन स्कूल से हासिल की। १९४२ में डिप्लोमा हासिल करने के बाद मैंने धर्मशास्र में स्पेशलाइजेशन के लिए यूनिवर्सिटी में एडमिशान लिया। धर्मशास्र में प्रवेश लेना आसान नहीं था। चर्च की खास सिफारिश पर ही इस विभाग में एडमिशन लिया जा सकता था और इसके लिए एक मुशिकल परीक्षा से भी गुजरना पडता था। मेरे लिए अलेक्जेन्डेरिया अलअटारिन चर्च ने सिफारिश की और लॉअर इजिप्ट की चर्च असेम्बली ने भी मेरा इम्तिहान लिया।

रविवार, 9 जनवरी 2011

अब मैं मुस्लिम के रूप में ही जीना चाहती हूं

वे कट्टर ईसाई थीं। लेकिन जब इस्लाम का अध्ययन किया और इस्लाम के रूप में सच्चाई सामने आई तो इसे अपना लिया।
पूर्व पादरी, मिशनरी, प्रोफेसर और धर्मशास्त्र में मास्टर डिग्री धारक खदीजा स्यू वेस्टन की जुबानी कि आखिर वे किस तरह इस्लाम की आगोश में आईं।
  यह तुम्हें क्या हो गया है? यह पहली प्रतिक्रिया होती थी जब इस्लाम अपनाने के बाद पहली बार मेरे क्लास के साथी, दोस्त और साथी पादरी मुझसे मिलते थे।
मुझे लगता मैं उनको दोष नहीं दे सकती थी। धर्म बदलने की वजह से मैं उनके लिए सबसे ज्यादा नापसंदीदा बन गई थी। पहले मैं प्रोफेसर, पादरी, चर्च प्लांटर और मिशनरी थी। धर्म के मामले में मैं बेहद कट्टर थी।    बात तब की है जब मैंने पादरियों की एक विशेष शिक्षण संस्था से ग्रेजुएशन के बाद धर्मशास्त्र में मास्टर डिग्री ली ही थी। इसके छह महीने बाद ही मेरी मुलाकात एक महिला से हुई जो सऊदी अरब में काम करती थी और वह इस्लाम अपना चुकी थी। मैंने उस महिला से जाना कि इस्लाम में महिलाओं को किस तरह की हैसियत और अधिकार दिए गए हैं? उसका जवाब जानकर मुझे बेहद हैरत हुई। दरअसल मैं नहीं जानती थी कि इस्लाम में महिलाओं को इतना ऊंचा मुकाम दिया गया है।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

टोनी ब्लेयर की साली मुसलमान बनी

ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की साली ने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल कर लिया है. चेरी ब्लेयर की बहन लौरेन बूथ ने पिछले दिनों  इस्लाम कबूल करने की घोषणा की. बूथ पेशे से पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 43 साल की बूथ ने इस्लाम कबूल करने की बात लंदन में पिछले दिनों  सामाजिक संगठन ग्लोबल पीस एंड यूनिटी 2010 के बैनर तले हुए एक कार्यक्रम में उजागर की. कई इस्लामिक  नेताओं की मौजूदगी में बूथ ने बताया कि उन्होंने यह फैसला उन लोगों की धारणा बदलने के लिए किया है जो इस्लाम को आतंकवाद फैलाने वाला मानते हैं.
http://www.dw-world.de/dw/article/0,,6147468,00.html

रविवार, 5 सितंबर 2010

सोच-समझकर इस्लाम चुना

आमिना थॉमस
(भूतपूर्व ‘अन्नम्मा थॉमस’)
ईसाई पादरी की बेटी
केरल, भारत
क़ुरआन और बाइबल के तुलनात्मक अध्ययन और सच्चे दिल से अल्लाह के सामने दुआ ने इस्लाम की ओर झुके हुए मेरे दिल को ताक़त दी और मैं अन्दर ही अन्दर मुसलमान हो गई।
  मैं दक्षिणी भारत के एक प्रोटेस्टेंट ईसाई घराने में पैदा हुई और पली-बढ़ी। लेकिन अब मैं बहुत ख़ुश हूं कि मैं एक मुस्लिम औरत हूं। केवल संयोगवश मुसलमान नहीं बनी, बल्कि ख़ूब सोच-समझकर मैंने इस्लाम का चयन किया है। संसार के पालनहार, जिसने सही रास्ते अर्थात् इस्लाम की ओर मेरा मार्गदर्शन किया, उसका मैं जितना भी शुक्र अदा करूं, कम है। मेरा इस्लाम क़बूल करना विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का परिणाम है।

रविवार, 29 अगस्त 2010

तीन हजार अमेरिकी सैनिकों ने अपनाया इस्लाम

नमाज़ अदा करते अमेरिकी मुस्लिम सैनिक
डॉ. अबू अमीना बिलाल फीलिप्
क्या आपने भी सुना था कि खाड़ी युद्ध के दौरान तीन हजार अमेरिकी सैनिकों ने इस्लाम अपना लिया था। यह सच है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस बदलाव के पीछे कौन हैं? जिन लोगों ने इस्लाम की यह दावत इन अमेरिकी सैनिकों तक पहुंचाई उनमें से एक अहम शख्सियत हैं डॉ. अबू अमीना बिलाल फीलिप्स। अबू अमीना फीलिप्स जमैका में जन्मे और पढ़ाई कनाड़ा में की । फिलहाल वे दुबई अमेरिकन यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं। अबू अमीना पहले ईसाई थे लेकिन 1972 में इस्लाम अपनाकर वे मुस्लिम बन गए।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

एक साथ तीन पादरी मुसलमान



अमेरिका के तीन ईसाई पादरी इस्लाम की शरण में आ गए। उन्हीं तीन पादरियों में से एक पूर्व ईसाई पादरी यूसुफ एस्टीज की जुबानी कि कैसे वे जुटे थे एक मिस्री मुसलमान को ईसाई बनाने में, मगर जब सत्य सामने आया तो खुद ने अपना लिया इस्लाम।
 बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि आखिर मैं एक ईसाई पादरी से मुसलमान कैसे बन गया? यह भी उस दौर में जब इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ हम नेगेटिव माहौल पाते हैं। मैं उन सभी का शुक्रिया अदा करता हूं जो मेरे इस्लाम अपनाने की दास्तां में दिलचस्पी ले रहे हैं। लीजिए आपके सामने पेश है मेरी इस्लाम अपनाने की दास्तां-
  मैं मध्यम पश्चिम के एक कट्टर इसाई घराने में पैदा हुआ था। सच्चाई यह है कि मेरे परिवार वालों और पूर्वजों ने अमेरिका में कई चर्च और स्कूल कायम किए। 1949 में जब मैं प्राइमेरी स्कूल में था तभी हमारा परिवार टेक्सास के हाउस्टन शहर में बस गया।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

एक अमेरिकी पादरी जिसने इस्लाम कबूल किया

       जेसॉन क्रुज,पूर्व ईसाई पादरी
अल्लाह का शुक्र है कि मुझे अल्लाह ने 2006 में इस्लाम रूपी बेशकीमती ईनाम से नवाजा। जब भी कोई मुझसे यह पूछता है कि मैं कैसे इस सच्चे धर्म की तरफ आया तो मैं झिझक जाता हूं। क्योंकि यह मेरी काबलियत नहीं बल्कि यह अल्लाह ही की हिदायत और रहमत है कि उसने मुझे सच्ची राह दिखाई। बिना अल्लाह की मर्जी और रहमत के कोई इस सच्चे मार्ग की तरफ नहीं आ सकता।
मैं न्यूयॉर्क के एक कैथोलिक परिवार में पैदा हुआ। मेरे माता और पिता रोमन कैथोलिक थे। हम इतवार को चर्च जाते थे। पहले मैंने ईसाई धर्म की शिक्षा ली,ईसा मसीह के स्मरणार्थ पहले भोज में शामिल हुआ और फिर मैंने रोमन कैथोलिक चर्च की सदस्यता कबूल कर ली। जब मैं जवान हुआ तो मुझे परमेश्वर की ओर से मार्गदर्शन के संकेत का अहसास होने लगा। इसका अर्थ मैंने यह लगाया कि यह मेरे लिए रोमन कैथोलिक पादरी बनने का मैसेज है। मैंने यह बात अपनी मां को बताई तो वह बहुत खुश हुई और वह मुझे हमारे इलाके के पादरी के पास ले गई।
इसे दुर्भाग्य मानें या सोभाग्य कि यह ईसाई पादरी अपने पेशे से खुश नहीं था और इसने मुझे पादरी बनने के विचार से ही दूर रहने की सलाह दी। इससे मैं विचलित हुआ। इस बीच परमेश्वर के शुरूआती मैसेज के अहसास को भूला देने,अपनी मूर्खता और किशोर अवस्था के चलते मैंने एक अलग ही रास्ता चुन लिया। बदकिस्मती से जब मैं सात साल का था तो मेरा परिवार बिखर गया। मेरे माता-पिता के बीच तलाक हो गया और मैं अपने पिता से दूर हो गया।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

अमरीकी महिला पत्रकार जो मुसलमान हो गयी

मेरी कोशिशों से तीन सौ व्यक्तियों ने मादक-द्रव्यों से तौबा की है और इक्कीस मर्दों और औरतों ने इस्लाम ग्रहण किया है। मैं एक अपाहिज औरत हूं। मगर मैं अपने आपको अपाहिज नहीं समझती, क्योंकि मेरा ईमान है कि जो व्यक्ति मुसलमान हो जाए, वह कभी अपाहिज नहीं हो सकता, क्योंकि खुदा उसका सहारा बन जाता है।सुश्री आमिना अश्वेत अमेरिकी महिला हैं, जो अपनी सामाजिक सेवाओं के कारण विश्व प्रसिद्ध हैं। १९८० ई० में इनके कार्यों पर एक पुस्तक प्रकाशित हुई। उसके अनुसार ३५० व्यक्तियों ने उनकी प्रेरणा से नशा-सेवन छोड़ा था और २१ औरत-मर्दों ने इस्लाम कबूल कर लिया था।
उल्लेखनीय बात यह है कि शिकागो न्यूज़ से संबंध रखने वाली विलक्षण प्रतिभा की धनी ये पत्रकार महिला शारीरिक रूप से अपंग हैं। वे शिकागो के हबशियों की झोपड़ पट्टी में पैदा हुई, जहां गन्दगियों, अपराधों, नशाख़ोरियों, निर्धनता और दरिद्रता का गढ़ था। उनका पैदाइशी नाम सिंथिया था और उनके पिता भी हबशियों की तरह आवारागर्द, नशाख़ोर और अपराधी प्रवृति के थे। उनकी मां ही श्वेत लोगों के घरों में मज़दूरी करके घर का खर्च चलाती थी। बाप की लापरवाही और क्रूरता के कारण वे बाल्यावस्था में ही पोलियो का शिकार हो गयीं।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

अमन और सुकून का केन्द्र केवल इस्लाम


मैं अध्ययन के बाद मुसलमान हुआ हूं। मेरे दिल में इस्लाम की बहुत कद्र है। मुसलमानों को इस्लाम विरासत में मिला है। इसलिए वे उसकी कद्र नहीं पहचानते। सच्चाई यह है कि मेरी जि़न्दगी में जितनी मुसीबतें आयीं, उनमें , अमन व सुकून की जगह केवल इस्लाम में ही मिली।
-मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल,इंग्लैण्ड
मार्माडियूक पिकथॉल 17 अप्रैल 1875 ई० को इंग्लैण्ड के एक गांव में पैदा हुए। उनके पिता चाल्र्स पिकथॉल स्थानीय गिरजाघर में पादरी थे। चाल्र्स के पहली पत्नी से दस बच्चे थे। पत्नी की मृत्यु के बाद चाल्र्स ने दूसरी शादी की, जिससे मार्माडियूक पिकथॉल पैदा हुए। मार्माडियूक ने हिब्रो के प्रसिद्ध पब्लिक स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। उनके सहपाठियों में, जिन लोगों ने आगे चलकर ब्रिटेन के राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया, उनमें सर विंस्टन चर्चिल भी शामिल थे। चर्चिल से उनकी मित्रता अंतिम समय तक क़ायम रही।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया

अगर मैं इस्लाम ना अपनाता तो एक खिलाड़ी के रूप में इतना कामयाब ना होता। इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया।
करीम अब्दुल जब्बार अमेरिका के मशहूर बास्केटबॉल खिलाड़ी
करीम अब्दुल जब्बार अमेरिकी नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन के छह बार बेशकीमती खिलाड़ी के रूप में चुने गए। उन्हें बास्केटबॉल का हर समय महान खिलाड़ी माना गया। वे अपन हरलेम के बाशिन्दे थे और फरडीनेन्ड लेविस एलसिण्डर के रूप में पैदा हुए। बास्केटबॉल में एक नया शॉट स्काई हुक ईजाद करने वाले करीम अब्दुल जब्बार ने इस शॉट के जरिए बास्केटबॉल खेल में अपनी खास पहचान बनाई।सबसे पहले करीम अब्दुल जब्बार ने इस्लाम हम्मास अब्दुल खालिस नामक एक मुस्लिम व्यक्ति से सीखा। खालिस ने उन्हें बताया कि हर एक को चाहे वह नन हो,संन्यासी,अध्यापक,खिलाड़ी अथवा टीचर,सभी को संजीदगी से ईश्वरीय आदेश पर गौर करना चाहिए। इस बात पर ध्यान देने के बाद वे खालिस क ी इस्लामिक बातों पर चिंतन करने लगे,साथ ही उन्होने कुरआन का अध्ययन करना शुरू कर दिया। कुरआन अच्छी तरह समझने के लिए उन्होने बेसिक अरबी सीखी। उन्होने इस्लाम को अच्छी तरह सीखने के मकसद से १९७३ में सऊदी अरब और लीबिया का सफर किया। वे सर्वशक्तिमान ईश्वर में अटूट भरोसा करते हैं और साथ ही उनका पुख्ता यकीन है कि कुरआन अल्लाह का आखरी आदेश है और मुहम्मद सल्ललाहो अलैहेवसल्लम अल्लाह के आखरी पैगम्बर हंै।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

कुरआन में मिला,मेरे हर सवाल का जवाब



मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि इस्लाम कबूल करने से पहले मैं किसी भी मुसलमान से नहीं मिला था। मैंने पहले कुरआन पढ़ा और जाना कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है जबकि इस्लाम हर मामले में पूर्णता लिए हुए है।
केट स्टीवन्स अब-यूसुफ इस्लाम इंग्लैण्ड के माने हुए पॉप स्टार
मैं आधुनिक रहन सहन ,सुख-सुविधाओं और एशो आराम के साथ पला बढ़ा। मैं एक ईसाई परिवार में पैदा हुआ। हम जानते हैं कि हर बच्चाकु दरती रूप से एक खास फितरत और और स्वभाव के साथ पैदा होता लेकिन उसके माता- पिता उसको इधर उधर के धर्मों की तरफ मोड़ देते हैं। ईसाई धर्म में मुझे पढ़ाया गया कि ईश्वर से सीधा ताल्लुक नहीं जोड़ा जा सकता। ईसा मसीह के जरिए ही उस ईश्वर से जुड़ा जा सकता है। यही सत्य है कि ईसा मसीह ईश्वर तक पहुंचन का दरवाजा है। मैंने इस बात को थोड़ा बहुत स्वीकार किया,लेकिन मैं इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं था। जब मैं मसीह की मूर्तियां देखता तो सोचता यह तो पत्थर मात्र है। इनमें कोई प्राण नहीं। लेकिन जब मैं सुनता कि यही ईश्वर है तो मैं उलझन में फंस जाता और आगे कोई सवाल भी नहीं कर पाता।

शनिवार, 5 सितंबर 2009

गॉड सिर्फ एक ही है


जर्मन के डॉ विलफराइड हॉफमेन ने १९८० में जब इस्लाम कबूल किया तो जर्मनी में हलचल मच गई। उनके इस फैसले का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ। उन्होने अपना नाम मुराद हॉफमेन रखा। जर्मनी के दूत और नाटो के सूचना निदेशक रह चुके डॉ मुराद हॉफमेन ने इस्लाम पर कई किताबें लिखी हैं।
१९८० में इस्लाम ग्रहण करने वाले डॉ हॉफमेन १९३१ में जर्मनी कैथोलिक ईसाई परिवार में पैदा हुए। उन्होने न्यूयार्क के यूनियन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और म्यूनिख यूनिवर्सिटी से कानूनी शिक्षा हासिल की। १९५७ में धर्मशास्र में डॉक्टरेट की। १९६० में हार्वर्ड लॉ स्कूल से उन्होने एलएलएम की डिग्री हासिल की। १९८३ से १९८७ तक ब्रूसेल्स में उन्होने नाटो के सूचना निदेशक के रूप में काम किया। वे १९८७ में अल्जीरिया में जर्मनी के दूत बने और फिर १९९० में मोरक्को में चार साल तक जर्मनी एम्बेसेडर के रूप में काम किया। उन्होने १९८२ में उमरा और १९९२ में हज किया। विभिन्न तरह के अनुभवों ने डॉ हॉफमेन को इस्लाम की ओर अग्रसर किया। जब वे १९६१ में

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

आखिर इन मशहूर लोगों ने क्यों अपनाया इसलाम



आप खुद अपनी आँखों से देख लीजिये इन हस्तियों को
जो इसलाम अपनाकर मुसलमान हो गए
यहाँ क्लिक कीजिये
http://www.youtube.com/watch?v=UbPEntwSF04
http://www.youtube.com/watch?v=8zIlPa_f-_M&feature=related

शनिवार, 15 अगस्त 2009

एक पत्रकार का इस्लाम कबूल करना

इस्लाम कबूल करने के पहले अब्दुल्लाह अडियार डी।एम.के. के प्रसिद्ध समाचार-पत्र 'मुरासोलीÓ के 17 वर्षो तक संपादक रहे। डी.एम.के. नेता सी.एन. अन्नादुराई जो बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी रहे, ने जनाब अडियार को संपादक पद पर नियुक्त किया था। जनाब अडियार ने 120 उपन्यास, 13 नाटक और इस्लाम पर 12 पुस्तकों की रचनाएं की।
जनाब अब्दुल्लाह अडियार महरहूम तमिल भाषा के प्रसिद्ध कवि, प्रत्रकार, उपन्यासकार और पटकथा लेखक थे। उनका जन्म 16 मई 1935 को त्रिरूप्पूर (तमिलनाडु) में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा कोयम्बटूर में हुई। वे नास्तिक थे, लेकिन विभिन्न धर्मों की पुस्तकें पढ़ते रहते थे। किसी पत्रकार और साहित्यकार को विभिन्न धर्मों के बारे में भी जानकारी रखनी पड़ती है। जनाब अब्दुल्लाह अडियार अध्ययन के दौरान इस परिणाम पर पहुंचे कि इस्लाम ही सच्चा धर्म है और मनुष्य के कल्याण की शिक्षा देता है। आखिरकार 6 जून 1987 ई। को वे मद्रास स्थित मामूर मस्जिद गये और इस्लाम कबूल कर लिया। इस्लाम कबूल करने के पहले वे डी।एम।के। के प्रसिद्ध समाचार-पत्र 'मुरासोलीÓ के 17 वर्षो तक संपादक रहे।